ड्राफ्ट सूची में नोएडा के सर्फाबाद गांव में चार ऐसे लोगों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट में दर्ज मिले जिनकी मृत्यु वर्षों पहले हो चुकी है। परिवारों ने स्वयं अधिकारियों को अवगत कराया, जिसके बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जांच के आदेश दिए। परिजनों का आरोप है कि बीएलओ न तो उनसे जानकारी लेने आया और न ही डेथ कैटेगरी में नाम हटाए।
उधर चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने डेटा रिकॉर्ड मिलान के दौरान लाजिकल एरर कैटेगरी में 1.93 करोड़ मतदाताओं को चिन्हित किया है। यह संख्या उन 1.04 करोड़ मतदाताओं से अलग है, जिनके रिकार्ड वर्ष 2003 की मतदाता सूची से नहीं मिले हैं। तार्किक त्रुटि श्रेणी में 83 लाख तो ऐसे मतदाता हैं, जिनके पिता के नाम मेल नहीं खा रहे हैं। किसी के नाम की स्पेलिंग गलत है तो किसी का नाम ही अधूरा है। साफ्टवेयर ने मतदाताओं के रिकार्ड मिलाने में पांच तरह की तार्किक त्रुटियां पकड़ी हैं। इन मतदाताओं की वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मैपिंग तो हो गई है लेकिन वे संदेह के घेरे में हैं। इनमें पहला पिता का नाम वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मेल न खाना है। इस श्रेणी के मतदाताओं के लिए राहत की बात यह है कि पिता का नाम मेल नहीं खाने वालों को चुनाव आयोग की तरफ से कोई नोटिस नहीं दी जाएगी। बीएलओ ऐसे मतदाताओं के घर आकर प्रमाण पत्र देखेंगे और उसे एप पर ठीक भी कर देंगे।
दूसरी श्रेणी में ऐसे मतदाताओं के नाम हैं जिनके छह या छह से अधिक बेटों ने मैपिंग की है। इसमें भी आयोग यह देख सकता है क्या वाकई में ऐसे परिवार हैं जिनमें इतने अधिक बेटे हैं। तीसरी श्रेणी में ऐसे नाम सामने आए हैं जिनमें मतदाता व उनके माता-पिता की उम्र में 15 वर्ष से कम का अंतर है। साफ्टवेयर ने चौथी श्रेणी में ऐसे मतदाताओं के नाम छांट रखे हैं जिनमें बाबा व पौत्र-पौत्री को उम्र में 50 वर्ष से कम का अंतर है। ऐसे मामले संदेह पैदा करते हैं।
पांचवीं श्रेणी में उन मतदाताओं को रखा गया है जो इस समय 45 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के हैं और पिछले एसआइआर यानी 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता के तो नाम हैं किंतु उनका नाम दर्ज नहीं है। ऐसे मतदाताओं को नोटिस मिलेगा या केवल जांच कराई जाएगी, यह अभी चुनाव आयोग ने स्पष्ट नहीं किया है। हालांकि पश्चिम बंगाल व दूसरे राज्यों में जिस तरह से तार्किक त्रुटि वाले मतदाताओं को नोटिस जारी हुए हैं, उससे यहां भी भविष्य में नोटिस दिए जाने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
नोटिस जारी होने के सात दिन बाद होगी सुनवाई
लखनऊ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) अभियान के तहत एक-दो दिनों में नोटिस बंटने शुरू हो जाएंगे। नोटिस जारी होने के बाद न्यूनतम सात दिन बाद सुनवाई की तिथि होगी।
इस बीच राजनीतिक बहस भी तेज हो चुकी है। विपक्ष का आरोप है कि असली मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि मृतक वोटर सूची में बने हुए हैं। वहीं राजनीतिक दल मतदाता जोड़ने की दौड़ में सक्रिय दिख रहे हैं। ड्राफ्ट जारी होने के तीन दिनों के भीतर 33,624 नए एप्लीकेशन आए हैं, जिनमें से 1,214 केवल भाजपा की ओर से जमा किए गए हैं।


