बिना पोस्टमॉर्टम कई शवों का हुआ अंतिम संस्कार:भागीरथपुरा दूषित पानी से मौत कैसे होगी साबित?; अब तक 16 लोगों की जान जा चुकी है

बिना पोस्टमॉर्टम कई शवों का हुआ अंतिम संस्कार:भागीरथपुरा दूषित पानी से मौत कैसे होगी साबित?; अब तक 16 लोगों की जान जा चुकी है

इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से 16 लोगों की मौत के मामले में अब स्थिति उलझती नजर आ रही है। खासकर मौतों को साबित करने को लेकर। अभी भी जिम्मेदार दूषित पानी पीने से कितने लोगों की मौत हुई है, यह ठोस रूप से कहने की स्थिति में नहीं है। शासन की ओर से हाईकोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट में सिर्फ 4 मौतों का ही जिक्र किया गया है। ऐसे में शेष 12 लोगों की मौत के कारणों को लेकर स्थिति और भी जटिल हो गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई शवों का पोस्टमॉर्टम तक नहीं कराया गया। ऐसी स्थिति में यह साबित करना आसान नहीं होगा कि उनकी मौत दूषित पानी के कारण हुई। विशेषज्ञों और कानूनविदों का मानना है कि बिना ठोस चिकित्सकीय प्रमाण के इन मौतों के मामलों में शासन मुआवजा कैसे देगा, यह बड़ा सवाल बन गया है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट। मौतें बढ़ती रहीं, जिम्मेदार टालते रहे पानी से जुड़ा कारण 29 दिसंबर की देर रात मंत्री कैलाश विजयवर्गीय अचानक दिल्ली से इंदौर पहुंचे और सीधे वर्मा हॉस्पिटल गए। इसी दौरान यह मामला सामने आया कि भागीरथपुरा के कई लोग पिछले एक सप्ताह से अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं और कुछ की हालत गंभीर है। मंत्री विजयवर्गीय ने उस समय 35 लोगों के भर्ती होने की बात कही, जबकि यह सिलसिला करीब 10 दिन पहले से चल रहा था। वास्तव में डेढ़ सौ से अधिक मरीज अस्पतालों में भर्ती हो चुके थे और कुछ को इलाज के बाद डिस्चार्ज भी किया जा चुका था। इसके बाद 30 दिसंबर की सुबह वर्मा हॉस्पिटल में भर्ती बुजुर्ग नंदलाल पाल (75) की मौत हो गई। उनकी मौत का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया गया और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए एमवाय अस्पताल भेजा गया। इस मौत को भी दूषित पानी से जोड़ने से लगातार इनकार किया जाता रहा। बाद में जब मौतों का सिलसिला बढ़ता गया, तब भी जिम्मेदार अधिकारियों ने दूषित पानी को मौतों का कारण मानने से इनकार किया। अब तक 16 लोगों की हो चुकी है मौत ऐसे सामने आती गईं नई-पुरानी मौतें …तो फिर 16 मौतें हुई हैं खास बात यह है कि सबसे पहले 21 दिसंबर को सुमित्रा बाई की मौत हुई थी। उनका भी पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया। हीरालाल की मौत का मामला तो शासन की रिपोर्ट से सामने आया। जिन चार मौतों को शासन ने स्वीकार किया है, उनमें उनका नाम शामिल है।
ऐसे में सुमित्रा बाई और हीरालाल को जोड़ें तो कुल मौतों की संख्या 16 हो जाती है, जबकि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय 14-15 मौतों की बात कर रहे हैं। जानिए अब कैसी परेशानियां सामने आ रही हैं क्या कहते हैं कानूनविद हाईकोर्ट एडवोकेट ऋषि आनंद चौकसे के अनुसार, घटना के संज्ञान में आने के बाद भी जिन लोगों की मौत हुई और जिनकी मृत्यु का स्पष्ट कारण सामने नहीं आ सका, उन्हें सामान्य मृत्यु माना गया। हालांकि, यह भी संभव है कि घटना के सामने आने से पहले भी कुछ लोगों की मौत दूषित पानी पीने के कारण हुई हो। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में मृतक के परिजन मृत्यु का कारण बता सकते हैं। यदि किसी क्षेत्र में अचानक बीमार होने वालों और मौतों की संख्या में वृद्धि होती है, तो यह संकेत हो सकता है कि मामला सामने आने से पहले भी दूषित पानी के सेवन से कुछ लोगों की जान गई हो। कानूनविद के मुताबिक, शासन द्वारा मुआवजा दिया जाना एक अलग विषय है, लेकिन यदि संबंधित मृतकों के परिजनों को यह राशि पर्याप्त नहीं लगती, तो वे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकते हैं। ऐसे मामलों में पूर्व में भी अदालतों के कई निर्णय रहे हैं, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि यदि शासन द्वारा पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया जाता, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। यदि याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर करता है, तो न्यायालय को यह पूर्ण अधिकार है कि वह मुआवजा राशि का निर्धारण कर शासन को परिजनों को उचित मुआवजा देने के आदेश दे। इसके लिए संबंधित पक्ष को पहले विधिवत आवेदन करना होगा। हालांकि, जिन मामलों में शवों का पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है, वहां स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है। ऐसे मामलों में परिजनों के पास मृत्यु के कारण को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण नहीं होते। यदि वे अदालत की शरण लेते हैं, तो उनके लिए यह साबित करना कठिन होगा कि मृत्यु का कारण क्या था।

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