राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल सड़क दुर्घटना का क्रिमिनल केस कोर्ट में विचाराधीन (Pending Trial) होना किसी चयनित अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी देने से इनकार का आधार नहीं हो सकता। जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक दोष साबित नहीं हो जाता, किसी भी व्यक्ति को निर्दोष माना जाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने आयुर्वेद विभाग द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत चयनित अभ्यर्थी बूंदी निवासी सुरेश कुमार मीणा की नियुक्ति रोक दी गई थी। कोर्ट ने विभाग को 30 दिन के भीतर नियुक्ति देने के आदेश दिए हैं। हादसा 2020 का, नौकरी 2023 की याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए एडवोकेट यशपाल खिलेरी ने कोर्ट को बताया कि सुरेश कुमार मीणा का चयन ‘आयुर्वेद कम्पाउण्डर/नर्स जूनियर ग्रेड भर्ती-2023’ में हुआ था। उसका नाम मेरिट लिस्ट में था, लेकिन पुलिस वेरिफिकेशन में सामने आया कि उसके खिलाफ वर्ष 2020 का एक आपराधिक मामला पेंडिंग है। वकील ने तर्क दिया कि यह मामला एक सड़क दुर्घटना का था। वर्ष 2020 में आमने-सामने की बाइक भिड़ंत में राधेश्याम खटीक नामक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी, जिसके कारण सुरेश के खिलाफ आईपीसी की धारा 279, 337 और 304-A के तहत मामला दर्ज हुआ था, जो अभी विचाराधीन है। विभाग की दलील: सर्कुलर रोकता है नियुक्ति आयुर्वेद विभाग ने 26 सितंबर 2025 को एक आदेश जारी कर सुरेश की नियुक्ति रद्द कर दी थी। विभाग ने कार्मिक विभाग के 4 दिसंबर 2019 के एक सर्कुलर का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि आपराधिक मामला पेंडिंग होने पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती। कोर्ट का तर्क: यह ‘नैतिक पतन’ नहीं है कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दुर्घटना का मामला ‘नैतिक पतन’ की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने ‘अमृत पाल बनाम राजस्थान राज्य’ और ‘मुकेश कुमार’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि महज चार्जशीट फाइल होने या ट्रायल पेंडिंग होने से किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिले अधिकारों का हनन है।


