नए साल के पहले ही दिन गयाजी शहर की ट्रैफिक व्यवस्था की पोल खुल गई। विष्णुपद मंदिर के समीप मुख्य मार्ग पर सुबह से जाम ने लोगों की परीक्षा ले ली। ट्रैफिक पुलिस और एसपी सिटी के तमाम दावे हवा हो गए। सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं की बाइकें लगी रहीं। कारें जहां-तहां अटकी रहीं। पुलिस मौके पर थी, लेकिन बेबस दिखी। नतीजा यह रहा कि करीब आधा किलोमीटर तक रेंगता जाम लग गया। हालात ऐसे बने कि वाहन तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया। नए वर्ष से ठीक एक दिन पहले एसपी सिटी रामानंद कौशल ने बयान जारी किया था। कहा गया था कि प्रमुख धार्मिक स्थलों पर पर्याप्त सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था रहेगी। यातायात सुचारु रहेगा। लेकिन नए साल की सुबह विष्णुपद मंदिर के पास हकीकत बयान से कोसों दूर दिखी। ड्यूटी पर तैनात महिला और पुरुष सिपाही केवल तमाशबीन बनकर रह गए। वे बाइक सड़क किनारे न लगाने की अपील करते रहे। सुनने वाला कोई नहीं था। ट्रैफिक पुलिस की तैयारी सिर्फ कागजों तक सिमटी असल सवाल प्लानिंग का है। यदि पुलिस ने पहले से रणनीति बनाई होती, तो मंदिर से आधा किलोमीटर पहले ही बाइक और कारों को रोक दिया जाता। पार्किंग के स्पष्ट इंतजाम होते। डायवर्जन लागू किया जाता। ऐसा कुछ नहीं हुआ। ट्रैफिक पुलिस की तैयारी कागजों तक सिमटी रही। मौके पर कोई ठोस नियंत्रण नजर नहीं आया। यह कोई नई स्थिति नहीं थी। हर साल नए वर्ष पर विष्णुपद मंदिर में भगवान हरि के दर्शन को रिकॉर्ड भीड़ जुटती है। प्रशासन यह बात भली-भांति जानता है। इसके बावजूद व्यवस्था शून्य दिखी। श्रद्धालु जाम में फंसे रहे। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे परेशान होते रहे। एंबुलेंस या आपात स्थिति के लिए कोई अलग रास्ता तक नहीं दिखा। आम अवाम को भगवान के दर्शन से पहले जाम से जूझने के लिए छोड़ दिया गया। सवाल यह भी है कि जब पहले से अनुमान था, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी। नए साल की पहली सुबह ने साफ संदेश दे दिया—दावे बड़े हैं, लेकिन व्यवस्था कमजोर। अगर यही हाल रहा, तो आस्था हर बार जाम में ही फंसती रहेगी। नए साल के पहले ही दिन गयाजी शहर की ट्रैफिक व्यवस्था की पोल खुल गई। विष्णुपद मंदिर के समीप मुख्य मार्ग पर सुबह से जाम ने लोगों की परीक्षा ले ली। ट्रैफिक पुलिस और एसपी सिटी के तमाम दावे हवा हो गए। सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं की बाइकें लगी रहीं। कारें जहां-तहां अटकी रहीं। पुलिस मौके पर थी, लेकिन बेबस दिखी। नतीजा यह रहा कि करीब आधा किलोमीटर तक रेंगता जाम लग गया। हालात ऐसे बने कि वाहन तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया। नए वर्ष से ठीक एक दिन पहले एसपी सिटी रामानंद कौशल ने बयान जारी किया था। कहा गया था कि प्रमुख धार्मिक स्थलों पर पर्याप्त सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था रहेगी। यातायात सुचारु रहेगा। लेकिन नए साल की सुबह विष्णुपद मंदिर के पास हकीकत बयान से कोसों दूर दिखी। ड्यूटी पर तैनात महिला और पुरुष सिपाही केवल तमाशबीन बनकर रह गए। वे बाइक सड़क किनारे न लगाने की अपील करते रहे। सुनने वाला कोई नहीं था। ट्रैफिक पुलिस की तैयारी सिर्फ कागजों तक सिमटी असल सवाल प्लानिंग का है। यदि पुलिस ने पहले से रणनीति बनाई होती, तो मंदिर से आधा किलोमीटर पहले ही बाइक और कारों को रोक दिया जाता। पार्किंग के स्पष्ट इंतजाम होते। डायवर्जन लागू किया जाता। ऐसा कुछ नहीं हुआ। ट्रैफिक पुलिस की तैयारी कागजों तक सिमटी रही। मौके पर कोई ठोस नियंत्रण नजर नहीं आया। यह कोई नई स्थिति नहीं थी। हर साल नए वर्ष पर विष्णुपद मंदिर में भगवान हरि के दर्शन को रिकॉर्ड भीड़ जुटती है। प्रशासन यह बात भली-भांति जानता है। इसके बावजूद व्यवस्था शून्य दिखी। श्रद्धालु जाम में फंसे रहे। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे परेशान होते रहे। एंबुलेंस या आपात स्थिति के लिए कोई अलग रास्ता तक नहीं दिखा। आम अवाम को भगवान के दर्शन से पहले जाम से जूझने के लिए छोड़ दिया गया। सवाल यह भी है कि जब पहले से अनुमान था, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी। नए साल की पहली सुबह ने साफ संदेश दे दिया—दावे बड़े हैं, लेकिन व्यवस्था कमजोर। अगर यही हाल रहा, तो आस्था हर बार जाम में ही फंसती रहेगी।


