नए साल 2026 के आगमन पर आज वीरवार को सिरसा में विभिन्न जगहों पर कार्यक्रम एवं सेलिब्रेशन आयोजित होंगे। इसमें युवाओं से लेकर कर्मचारी एवं महिलाएं शिरकत करेंगे। खासकर सुर्खाब, एमएसजी रिजोर्ट सहित अन्य जगह पर कार्यक्रम आयोजित किए हैं। साथ ही सिरसा के पहले संत श्री बाबा बिहारी जी का 55 वां महा परिनिर्वाण दिवस एक जनवरी वीरवार को पारंपरिक तरीके से श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। आज वीरवार को ट्रस्ट की ओर से हवन एवं पूजन किया जाएगा और विभिन्न जगहों से संत पहुंचेंगे। रात्रि को महा परिनिर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में भजन संध्या हुई। इस दौरान गोबिंद कांडा सहित अन्य नेता मौजूद रहेंगे। साल 2025 की अंतिम रात्रि (31 दिसंबर) को लोगों ने आतिशबाजी की और जश्न मनाया। घरों में डीजे बजाकर झूमे। बाबा सरसाईंनाथ के जीवन के बारे में जानिएं: बाबा सरसाईंनाथ की नगरी में साल 1972 में रानियां रोड पर बाबा बिहारी समाधि बनाई गई। वे अपने जीवन के अंतिम 6 माह तक बाबा विहारी शहर की अरोड़ा सुनारां वाली गली में स्थित अपने मकान में रहे। अब उनकी जन्मस्थली को मंदिर का रूप दिया जा रहा है। बाबा बिहारी जिस कमरे में रहते थे, उसमें उनका स्वरूप स्थापित किया जाएगा। मार्च माह तक मंदिर आम लोगों के दर्शन के लिए शुरू हो जाएगा। बाबा विहारी का जन्म 18 अगस्त 1896 में हुआ था। उनके पिता मग्घर मल एक कारोबारी थे, उनका आहत का भी व्यवसाय था। मां अकी देवी धर्मपरायण स्त्री थी। उनके भाई करते थे। करीब 18 वर्ष की आयु में बल्लीराम पिता के साथ व्यवसाय में बाचा विहारी का विवाह भावदीन के एक परिवार में जमना देवी के बाबा बिहारी साथ हुआ। बालक बिहारी फकीर थे। उनके पिता ने कई कारोबार करवाए, पर बाबा सांस्नारिक मोह माया से दूर थे। उनकी रुचि किसी भी व्यवसाय में नहीं रही। अक्सर घर से बाहर रहते थे। उस समय शहर जंगलों से घिरा था। एक दफा पिता मग्धर मल ने बेटे को घर के चौबारे पर बंद कर दिया। कमरे में कोई खिड़की नहीं थी। चौबारे का ताला खोला तो और पिता ने ससुराल वालों को बालक बाबा बिहारी अंदर नहीं थे। वे बाहर खड़े थे। इसके बाद पिता ने उन्हें कभी नहीं टोका और बाबा विहारी शिव साधना में लीन हो गए। बाद में उन्होंने बाबा श्योराम को भी अपने साथ जोड़ लिया। गुरु नानक देव जी के बेटे श्रीचंद के दर्शन और धर्मशास्त्र के आधार पर लोगों को शिक्षा देने लगे। जीवन के अंतिम 6 माह तक वे अरोड़ा सुनारां वाली गली स्थित अपने मकान में रहे और 1971 को चोला छोड़ दिया। बाद में यह मकान कई लोगों के पास रहा। 2 साल पहले इस मकान को कपिल सोनी एवं उनके परिवार ने बाबा बिहारी स्मृति चैरिटेबल ट्रस्ट को दे दिया। बाबा बिहारी समाधि के मुख्य सेवक गुलाब गुर्जर ने बताया, 1972 में उनकी स्मृति में रानियां रोड पर बाबा बिहारी समाधि का निर्माण किया गया। 51 साल तक जो भी इस मकान में रहा, किसी ने भी एक कील तक नहीं लगाई। मकान की दीवारों में कभी सीलन नहीं आई। पुरातत्व विभाग के एक आर्किटेक्ट जो इन दिनों में मिस्त्र में शोध कर रहे हैं, जिनके कहने पर ही मकान की किसी भी दीवार, छत्त को नहीं छेड़ा गया।


