सीवान के जीरादेई प्रखंड अंतर्गत मियां के भटकन पंचायत के गोठी गांव में पीपल के वृक्ष की जड़ के नीचे से मिली चांदी की बुद्ध प्रतिमा ने क्षेत्र में ऐतिहासिक और धार्मिक हलचल पैदा कर दी है। रविवार को प्रतिमा के मिलने के बाद ग्रामीण महिलाओं ने विधिवत पूजा-अर्चना आरंभ कर दी, वहीं गांव से लेकर जिले भर में यह खोज चर्चा का प्रमुख विषय बन गई है। इतिहासकार बोले- ऐतिहासिक और धार्मिक संकेत इतिहासकार एवं शोधार्थी डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ने इस खोज को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पीपल की जड़ के नीचे से पीपल के पत्ते के आकार की बुद्ध प्रतिमा का मिलना महज संयोग नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा ऐतिहासिक और धार्मिक संकेत छिपा हो सकता है। उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म में प्रतीक पूजा का विशेष महत्व है और पीपल के पत्ते को सम्बोधि अर्थात बोधि ज्ञान का प्रतीक माना गया है। प्राचीन काल में कला और स्थापत्य में भी पीपल के पत्तों का अंकन व्यापक रूप से किया जाता रहा है। बोध गया से संबंधित पेड़ की डाल हो सकता है पेड़ डॉ. सिंह के अनुसार, इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि बोध गया स्थित बोधि वृक्ष की डालें विभिन्न स्थानों पर ले जाकर रोपी गई थीं। ऐसी संभावना है कि गोठी गांव में भी बोध गया से संबंधित किसी पवित्र डाल का रोपण किया गया हो। उससे पूर्व आस्था के प्रतीक स्वरूप पीपल की जड़ में बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की गई हो। उन्होंने कहा कि पीपल के वृक्ष के संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि यह न केवल धार्मिक आस्था बल्कि ऐतिहासिक धरोहर से भी जुड़ा हो सकता है। चांदी की बुद्ध प्रतिमाएं किसी एक काल तक सीमित नहीं रहीं डॉ.कृष्ण कुमार सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि चांदी की बुद्ध प्रतिमाएं किसी एक काल तक सीमित नहीं रहीं। कुषाण काल से लेकर गुप्त काल और उसके बाद के समय तक धातु की बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण होता रहा है। हालांकि, गुप्त काल के दौरान इनका निर्माण विशेष रूप से अधिक हुआ था। गोठी गांव के आसपास बड़ी संख्या में गुप्तकालीन ईंटों (इट्ट) का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि यहां कभी बौद्ध विहार या बौद्ध बस्ती रही होगी। उन्होंने यह भी बताया कि ‘गोठी’ शब्द का अर्थ जमाव या समूह से होता है, जो यहां किसी संगठित धार्मिक या सामाजिक संरचना की ओर इशारा करता है। खोज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध और अध्ययन का विषय डॉ. सिंह ने कहा कि यह खोज केवल स्थानीय आस्था का विषय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध और अध्ययन का विषय है। यदि वैज्ञानिक और पुरातात्विक जांच होती है तो सीवान का यह क्षेत्र बौद्ध इतिहास के मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है। सीवान के जीरादेई प्रखंड अंतर्गत मियां के भटकन पंचायत के गोठी गांव में पीपल के वृक्ष की जड़ के नीचे से मिली चांदी की बुद्ध प्रतिमा ने क्षेत्र में ऐतिहासिक और धार्मिक हलचल पैदा कर दी है। रविवार को प्रतिमा के मिलने के बाद ग्रामीण महिलाओं ने विधिवत पूजा-अर्चना आरंभ कर दी, वहीं गांव से लेकर जिले भर में यह खोज चर्चा का प्रमुख विषय बन गई है। इतिहासकार बोले- ऐतिहासिक और धार्मिक संकेत इतिहासकार एवं शोधार्थी डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ने इस खोज को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पीपल की जड़ के नीचे से पीपल के पत्ते के आकार की बुद्ध प्रतिमा का मिलना महज संयोग नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा ऐतिहासिक और धार्मिक संकेत छिपा हो सकता है। उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म में प्रतीक पूजा का विशेष महत्व है और पीपल के पत्ते को सम्बोधि अर्थात बोधि ज्ञान का प्रतीक माना गया है। प्राचीन काल में कला और स्थापत्य में भी पीपल के पत्तों का अंकन व्यापक रूप से किया जाता रहा है। बोध गया से संबंधित पेड़ की डाल हो सकता है पेड़ डॉ. सिंह के अनुसार, इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि बोध गया स्थित बोधि वृक्ष की डालें विभिन्न स्थानों पर ले जाकर रोपी गई थीं। ऐसी संभावना है कि गोठी गांव में भी बोध गया से संबंधित किसी पवित्र डाल का रोपण किया गया हो। उससे पूर्व आस्था के प्रतीक स्वरूप पीपल की जड़ में बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की गई हो। उन्होंने कहा कि पीपल के वृक्ष के संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि यह न केवल धार्मिक आस्था बल्कि ऐतिहासिक धरोहर से भी जुड़ा हो सकता है। चांदी की बुद्ध प्रतिमाएं किसी एक काल तक सीमित नहीं रहीं डॉ.कृष्ण कुमार सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि चांदी की बुद्ध प्रतिमाएं किसी एक काल तक सीमित नहीं रहीं। कुषाण काल से लेकर गुप्त काल और उसके बाद के समय तक धातु की बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण होता रहा है। हालांकि, गुप्त काल के दौरान इनका निर्माण विशेष रूप से अधिक हुआ था। गोठी गांव के आसपास बड़ी संख्या में गुप्तकालीन ईंटों (इट्ट) का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि यहां कभी बौद्ध विहार या बौद्ध बस्ती रही होगी। उन्होंने यह भी बताया कि ‘गोठी’ शब्द का अर्थ जमाव या समूह से होता है, जो यहां किसी संगठित धार्मिक या सामाजिक संरचना की ओर इशारा करता है। खोज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध और अध्ययन का विषय डॉ. सिंह ने कहा कि यह खोज केवल स्थानीय आस्था का विषय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध और अध्ययन का विषय है। यदि वैज्ञानिक और पुरातात्विक जांच होती है तो सीवान का यह क्षेत्र बौद्ध इतिहास के मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है।


