सुरों की साधना और शहनाई की मिठास से सजी तानसेन की संध्या

सुरों की साधना और शहनाई की मिठास से सजी तानसेन की संध्या

ग्वालियर। संगीतधानी ग्वालियर में आयोजित विश्वविख्यात 101वें तानसेन संगीत समारोह के तीसरे दिन की सांध्यकालीन सभा सुर, लय और भावनाओं की अनुपम संगति का साक्षी बनी। पुणे से पधारे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पं. संजीव अभ्यंकर और प्रख्यात शहनाई वादक शैलेश भागवत की सजीव और भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। सुरों की पहली गूंज के साथ ही सभास्थल का वातावरण साधना, श्रद्धा और संगीत-रस से सराबोर हो उठा।

कार्यक्रम की शुरुआत पं. संजीव अभ्यंकर के सधे हुए गायन से हुई। उन्होंने अपनी विशिष्ट गायकी, मधुर स्वर-संयोजन और शुद्ध सुरों के माध्यम से श्रोताओं को आरंभ से ही बांध लिया। आलाप की विस्तारपूर्ण प्रस्तुति के बाद उन्होंने बंदिश “पिया बिन जानत ना” का अत्यंत भावपूर्ण गायन किया। इस रचना में विरह और करुणा के भाव इतने सजीव रूप में उभरे कि श्रोता भावविभोर हो उठे। उनकी स्पष्ट तानों और सटीक लयबद्धता ने प्रस्तुति को विशेष ऊंचाई प्रदान की।

इसके पश्चात मंच पर प्रख्यात शहनाई वादक शैलेश भागवत ने अपनी कला का जादू बिखेरा। उन्होंने राग शुद्ध कल्याण की मनोहारी प्रस्तुति दी, जिसमें शहनाई के स्वर कभी शांत, तो कभी ऊर्जावान रूप में प्रवाहित होते रहे। शहनाई की मधुर तानों ने पूरे परिसर को अपनी मिठास से भर दिया और श्रोताओं को एक अलौकिक अनुभूति प्रदान की। उनकी प्रस्तुति में राग की गरिमा, भाव-प्रवणता और शास्त्रीय अनुशासन का सुंदर संतुलन देखने को मिला।

संगत में तबले पर मनोज पाटीदार ने सशक्त एवं संवेदनशील संगत कर प्रस्तुति को मजबूती दी, जबकि हारमोनियम पर विवेक जैन के मधुर स्वरों ने गायन और वादन दोनों में सौंदर्य का संचार किया। तानपुरे पर अजय गुरु ने स्थायी स्वर देकर संपूर्ण प्रस्तुति की सुदृढ़ नींव रखी।

तीसरे दिन की यह सांध्यकालीन सभा तानसेन समारोह की गरिमा और शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को एक बार फिर जीवंत कर गई।

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