Sathankulam Custodial Death Case: तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के सतनकुलम पुलिस स्टेशन में हुई क्रूर कस्टोडियल टॉर्चर की घटना में आखिरकार ऐतिहासिक न्याय हुआ है। 6 अप्रैल 2026 को मदुरै की फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को सजा-ए-मौत (फांसी) की सजा सुनाई। जज जी. मुथुकुमारन ने इस मामले को पुलिस बर्बरता का दुर्लभ उदाहरण बताते हुए सभी आरोपियों को हत्या का दोषी करार दिया।
पिता-पुत्र की पुलिस स्टेशन में बेरहमी से हत्या
घटना 19 जून 2020 की है। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान सतनकुलम में मोबाइल शॉप चलाने वाले 59 वर्षीय पी. जयराज और उनके 31 वर्षीय बेटे जे. बेनिक्स (बेन्निक्स) को दुकान समय से ज्यादा खुली रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बाद में यह आरोप झूठा साबित हुआ। पुलिस स्टेशन में दोनों को पूरी रात क्रूर यातना दी गई। लाठियों से इतनी बुरी पिटाई की गई कि स्टेशन की मेज और लाठियों पर खून के निशान लग गए। एक महिला कांस्टेबल ने भी अदालत में इसकी गवाही दी।
सीबीआई ने 10 पुलिसकर्मियों को किया गिरफ्तार
यातना के कारण दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया, लेकिन चोटों के चलते कुछ दिनों में दोनों की मौत हो गई। पूरे देश में पुलिस अत्याचार के खिलाफ आक्रोश फैल गया। मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने 10 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया, जिसमें एक इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर और कई हेड कांस्टेबल व कांस्टेबल शामिल थे। एक आरोपी सब-इंस्पेक्टर जांच के दौरान कोविड से मर गया।
9 पुलिसकर्मियों को सजा-ए-मौत
सजा पाने वाले 9 पुलिसकर्मी हैं- इंस्पेक्टर एस. श्रीधर, सब-इंस्पेक्टर पी. रघु गणेश और के. बालकृष्णन, हेड कांस्टेबल एस. मुरुगन और ए. समीदुराई, कांस्टेबल एम. मुथुराज, एस. चेल्लादुराई, एक्स. थॉमस फ्रांसिस और एस. वेलुमुथु। अदालत ने पुलिस की प्राकृतिक मौत वाली दलील खारिज कर दी और साबित किया कि बार-बार मारपीट और यातना से ही दोनों की मौत हुई। सीसीटीवी फुटेज डिलीट करने और सबूत मिटाने की कोशिश भी सामने आई।
1.40 करोड़ मुआवजा देने का आदेश
कोर्ट ने सभी 9 दोषियों को सामूहिक रूप से परिवार को 1.40 करोड़ रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया। मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले को कस्टोडियल मौतों के खिलाफ दुर्लभ न्याय बताया है। आमतौर पर पुलिसवालों के खिलाफ ऐसे मामलों में सजा बहुत कम होती है, इसलिए इस फैसले को ऐतिहासिक माना जा रहा है।


