भारत सरकार ने पद्म पुरस्कार-2026 की घोषणा कर दी है। भगवानदास रैकवार (83) को अखाड़ा संस्कृति की प्राचीनतम युद्ध शैली (अनसंग हीरोज कैटेगरी) के लिए पद्मश्री के लिए चुना गया है। भगवानदास मकरोनिया इलाके के रजाखेड़ी में अपनी बेटी के घर रह रहे हैं। सम्मान की घोषणा होते ही परिवार में खुशी का माहौल है। परिचित बधाइयां देने पहुंच रहे हैं। सागर में चार साल में दूसरा पद्मश्री अवार्ड मिला है। दैनिक भास्कर ने भगवानदास रैकवार से बात की…उन्होंने बताया कि सागर में जहां हम रहते थे। पास में ही अखाड़ा था, वहां पर गुरु रामचरण रावत अखाड़े का प्रशिक्षण देते थे। बचपन से ही अखाड़ा देखते आ रहा था। करीब 16-17 साल की उम्र में परिवार और गुरु के कहने पर अखाड़ा खेलना शुरू किया। लेकिन उसके बाद अखाड़े को मैंने अपना जीवन बना लिया। पूरी आत्मा के साथ अखाड़ा सीखा। ट्रेंड होने के बाद बेटियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उन्होंने कहा यह मेरा सम्मान नहीं, कला का सम्मान है। मेरे जीवन का उद्देश्य इस सम्मान के साथ पूरा हुआ। 16 साल की उम्र से अखाड़ा सीखना शुरू किया
भगवानदास रैकवार ने 16 साल की उम्र से अखाड़ा सीखना शुरू किया था। उन्होंने बताया कि परिवार और गुरु लगा मुझे अखाड़ा खेलने के लिए प्रोसाहित करते थे। मैं भी अखाड़े के मैदान में कूद गया। जिसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसमें विशेष कला यह थी कि मैं लाठी से किसी भी व्यक्ति को बांध देता था।
समय कम पड़ा तो बैंक की नौकरी से दिया था त्याग पत्र
भगवानदास रैकवार सागर में ही सरकारी बैंक में नौकरी करते थे। अखाड़े में आने और प्रशिक्षण देने के लिए उन्हें अक्सर कई राज्यों में जाना पड़ता था। वे नौकरी के साथ अखाड़े को समय नहीं दे पा रहे थे। समय कम पड़ने पर उन्होंने निर्णय लिया कि वे नौकरी छोड़ेंगे और वर्ष 1998 में बैंक की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। जिसके बाद वह पूरा समय अखाड़े में देते थे। देशभर में बेटियों को दिया प्रशिक्षण
अखाड़ा (पारंपरिक मार्शल आर्ट्स) का प्रशिक्षण देने के लिए भगवानदास रैकवार देशभर में जाते थे। उन्होंने इस दौरान बेटियों को प्रशिक्षण देकर आत्मरक्षा के लिए सशक्त बनाया। उन्होंने बताया कि रसिया, हिमाचल प्रदेश, हैदराबाद, जयपुर, लखनऊ, उत्तरप्रदेश, नागपुर, मुंबई समेत स्थानों पर प्रशिक्षण देने के लिए गए हैं। पिताजी लाठी से लोगों को बांध देते थे
बेटे राजकुमार रैकवार ने बताया कि पिता भगवानदास के शिष्य पूरे देश में फैले हुए हैं। उन्होंने बुंदेली शैली में शस्त्र युद्ध लोगों को सिखाया है। उनकी एक शैली थी बंदिश। इस शैली वह रस्सी, तार की तरह किसी भी व्यक्ति को लट्ठ से बांध देते थे। वह तब तक नहीं छूट पाता था, तब तक वह स्वयं न खोले। यदि वह कोशिश करता था तो शरीर को नुकसान होता था। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। जीवन भर बुंदेली मार्शल आर्ट और संस्कृति को जीवित रखने का कार्य किया। उन्होंने कई पीढ़ियों को अखाड़ा कला का प्रशिक्षण दिया। बुंदेलखंड की पारंपरिक विरासत को नई पहचान दिलाई। पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद सागर शहर समेत पूरे बुंदेलखंड में खुशी और गर्व का माहौल है। चार साल पहले रामसहाय पांडे को मिला था पद्मश्री
सागर में पिछले चार सालों में यह दूसरा पद्मश्री अवॉर्ड मिला है। इससे पहले वर्ष 2022 में सागर के कनेरादेव में रहने वाले 94 वर्षीय रामसहाय पांडे को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह सम्मान बुंदेली राई नृत्य के लिए दिया गया था। हालांकि पिछले साल पद्मश्री रामसहाय पांडे का निधन हो गया है।


