इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 35 मौतों का मामला अभी शांत नहीं हुआ है। पिछले दो दिनों से विधानसभा सत्र में विपक्ष ने सरकार को इस मुद्दे पर जमकर घेरा है। शुक्रवार को विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव को विधानसभा अध्यक्ष ने खारिज कर दिया और कहा कि इस विषय पर अब सदन में चर्चा नहीं होगी। इसके बावजूद विपक्ष का रुख आक्रामक बना हुआ है। इसी बीच इस गंभीर प्रकरण में जिन 35 मृतकों में से केवल एक युवक का पोस्टमॉर्टम कराया गया था, उसकी रिपोर्ट ‘दैनिक भास्कर’ को मिली है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस रिपोर्ट में भी फोरेंसिक विशेषज्ञ ने मौत का कारण (ओपिनियन) दर्ज नहीं किया है। स्थिति यह है कि 34 शवों का अंतिम संस्कार बिना पोस्टमॉर्टम के कर दिया गया और जिस एक का परीक्षण हुआ, उसमें भी मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों के वास्तविक कारणों की पुष्टि कैसे होगी?। इस मामले को करीब दो माह हो चुके हैं और यह लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। जिस युवक की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट सामने आई है, उसका परीक्षण 1 जनवरी को एमवाय अस्पताल में किया गया था। उसे 31 दिसंबर को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी। परिजन उसे वर्मा हॉस्पिटल ले गए, जहां डॉक्टरों ने हालत गंभीर बताते हुए भर्ती करने की सलाह दी। इसके बाद उसे एमवाय अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। दरअसल वह भागीरथपुरा में काम करने गया था और वहीं दूषित पानी पीने से बीमार पड़ा था। पोस्टमॉर्टम को लेकर विधानसभा में हुई थी तीखी बहस विधानसभा में गुरुवार को विपक्ष ने जब पोस्टमॉर्टम का मुद्दा उठाया तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि सारी मौतों में पोस्टमॉर्टम करवाना संभव नहीं है। दूसरी ओर, विपक्ष का कहना था कि सरकार सामान्य मौतें होने पर 4 लाख रुपए का मुआवजा दे रही है और भागीरथपुरा में दो लाख रुपए दिए जा रहे हैं, इन्हें भी 4 लाख रुपए दिया जाए। महामारी बताया तो फिर पोस्टमॉर्टम क्यों नहीं कराया नीरज सोनी (सीनियर एडवोकेट, हाईकोर्ट) के मुताबिक, इस मामले में हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान शासन ने अपना पक्ष रखते हुए इसे महामारी घोषित किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार ने कोरोना को महामारी घोषित किया था, तब उससे हुई मौतों के मामलों में संबंधित शवों का पोस्टमॉर्टम कराया गया था। ऐसे में भागीरथपुरा में जो मौतें हुई हैं, उनका पोस्टमॉर्टम इस आधार पर कराया जाना चाहिए था कि वे असामान्य मौतें हैं। दूषित पानी से मौत नहीं मानते तो मुआवजा क्यों? नीरज सोनी ने बताया कि यदि पोस्टमॉर्टम नहीं कराया जाता, तो आगे चलकर सरकार यह पक्ष रख सकती थी कि भागीरथपुरा में हुई सभी मौतें सामान्य थीं। चूंकि पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, इसलिए मुआवजा नहीं दिया जा रहा। ऐसा तर्क दिया जा सकता था। यह सरकार का एक छद्म कदम प्रतीत होता है। जब स्वयं सरकार के वक्तव्यों के अनुसार यह महामारी थी, तो सभी 35 मृतकों का पोस्टमॉर्टम कराया जाना चाहिए था। यदि सरकार इन मौतों को दूषित पानी से हुई मौतें नहीं मान रही है, तो फिर मुआवजा क्यों दिया जा रहा है? ये दोनों बातें स्पष्ट रूप से विरोधाभासी हैं। खास पहलू यह है कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी ने ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द का उपयोग किया। उनका आशय यह था कि अस्पताल से सूचना मिली कि मरीज की मृत्यु हो गई। यानी बिना कारण की विधिवत पुष्टि किए ही मृत्यु दर्ज कर ली गई। इस तर्क को हाई कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। स्पष्ट है कि सरकार इन मौतों को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है और मामले में अब भी लीपापोती जारी है। पोस्टमॉर्टम नहीं कराने के लिए ये हैं जिम्मेदार एडवोकेट सोनी के मुताबिक, जब यह घटनाक्रम शुरू हुआ, तब इसे महामारी घोषित नहीं किया गया था, लेकिन यह कहा जा रहा था कि मौतें सामान्य नहीं, बल्कि दूषित पानी के कारण हुई हैं। ऐसी स्थिति में इन असामान्य मौतों का आकलन करने के लिए सबसे पहले पोस्टमॉर्टम कराना कलेक्टर की जिम्मेदारी थी। चूंकि इस मामले में एक हाई पावर कमेटी बनाई गई थी और मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही थी, इसलिए कमेटी प्रमुख को इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए थे। क्यों और किन परिस्थितियों में जरूरी है पोस्टमॉर्टम कानूनविदों के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति की मौत यदि सामान्य परिस्थितियों में न होकर संदिग्ध या अप्राकृतिक हालात में होती है, तो उसके वास्तविक कारणों का खुलासा करने के लिए पोस्टमॉर्टम किया जाता है। यह एक चिकित्सीय और कानूनी प्रक्रिया है, जो मृत्यु के पीछे की सच्चाई सामने लाने में निर्णायक भूमिका निभाती है। पोस्टमॉर्टम के माध्यम से यह स्पष्ट किया जाता है कि मौत बीमारी, दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या, जहर, करंट, जलने, डूबने या किसी अन्य कारण से हुई है या नहीं। इसके साथ ही मृत्यु का अनुमानित समय और शरीर पर मौजूद चोटों की प्रकृति भी जांची जाती है। कानूनी जांच का अहम साक्ष्य पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को कोर्ट में महत्वपूर्ण कानूनी साक्ष्य माना जाता है। इसी आधार पर पुलिस आगे की जांच तय करती है। कई मामलों में यह रिपोर्ट हत्या को दुर्घटना या आत्महत्या से अलग साबित करने में निर्णायक होती है। कानूनी मामलों में होने वाले पोस्टमॉर्टम के लिए परिजनों की अनुमति आवश्यक नहीं होती। वहीं, सामान्य या क्लिनिकल पोस्टमॉर्टम के लिए परिजनों की सहमति ली जाती है। प्राकृतिक मौत में नहीं होती जरूरत यदि मौत किसी पुरानी बीमारी के कारण हुई हो और इलाज करने वाले डॉक्टर द्वारा मृत्यु का स्पष्ट कारण प्रमाणित कर दिया गया हो तो पोस्टमॉर्टम की आवश्यकता नहीं होती। भागीरथपुरा मामले में कुछ बुजुर्गों को पहले से दूसरी बीमारियां जरूर थी लेकिन वे चलते-फिरते थे। दूषित पानी पीने से ही उनकी हालत बिगड़ी और फिर मल्टी ऑर्गन्स फेल होते गए और मौत हो गई। 5 मार्च को हाई कोर्ट में अगली सुनवाई इस मामले को लेकर आयोग ने सार्वजनिक सूचना भी जारी की है। इसमें प्रभावित लोगों, उनके परिवारों, जनप्रतिनिधियों, डॉक्टरों, अस्पतालों, सामाजिक संगठनों, ठेकेदारों, सरकारी अधिकारियों और ऐसे किसी भी व्यक्ति से अपील की है। जिसके पास इस मामले से जुड़ी कोई जानकारी, कागजात या सबूत हों। वे आयोग के सामने आकर अपनी बात रखें और सहयोग करें। यह जांच आम लोगों की सुरक्षा और न्याय के लिए की जा रही है। इस मामले में 5 मार्च को हाई कोर्ट में सुनवाई है।


