2002 जानलेवा हमला मामला, धनंजय सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को नोटिस जारी

2002 जानलेवा हमला मामला, धनंजय सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को नोटिस जारी

 Dhananjay Singh Supreme Court notice:  वर्ष 2002 में वाराणसी में हुए कथित जानलेवा हमले के मामले में लंबे समय से न्याय की लड़ाई लड़ रहे पूर्व सांसद धनंजय सिंह ने अब देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया है। लोअर कोर्ट और हाईकोर्ट से अपेक्षित न्याय न मिलने के बाद धनंजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने आज बड़ा कदम उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अभय सिंह समेत सभी आरोपियों को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 20 फरवरी को निर्धारित की गई है। इस फैसले के बाद एक बार फिर 22 साल पुराने इस हाई-प्रोफाइल मामले ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल मचा दी है। धनंजय सिंह की इस अपील को न्याय की लंबी लड़ाई में एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है पूरा मामला

मामला वर्ष 2002 का है, जब वाराणसी में धनंजय सिंह पर कथित रूप से जानलेवा हमला किया गया था। उस समय धनंजय सिंह प्रदेश की राजनीति में एक उभरता हुआ चेहरा थे। आरोप है कि हमले की नीयत से उन पर साजिश रची गई और उन पर हमला किया गया, जिसमें वह बाल-बाल बचे।


 Dhananjay Singh Supreme Court notice

इस मामले में अभय सिंह समेत कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। शुरुआती जांच के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मामला ट्रायल कोर्ट में चला, जहां से धनंजय सिंह को अपेक्षित न्याय नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी।

निचली अदालत और हाईकोर्ट से निराशा

धनंजय सिंह की ओर से यह तर्क लगातार दिया जाता रहा कि मामले की जांच और सुनवाई में कई गंभीर खामियां रही हैं। गवाहों के बयान, साक्ष्यों के मूल्यांकन और कानूनी प्रक्रियाओं में कथित तौर पर चूक का आरोप लगाया गया। लोअर कोर्ट के फैसले के बाद जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तब भी उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद पूरी नहीं हुई। इसी के बाद धनंजय सिंह ने अंतिम विकल्प के तौर पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला लिया।

सुप्रीम कोर्ट का अहम कदम

सुप्रीम कोर्ट ने धनंजय सिंह की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने अभय सिंह सहित सभी आरोपियों को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब तलब किया है। यह कदम इस बात का संकेत माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत मामले की गहराई से जांच करना चाहती है। कानूनी जानकारों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि अदालत को प्रथम दृष्टया याचिका में विचारणीय बिंदु नजर आए हैं।

20 फरवरी को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 20 फरवरी तय की है। उस दिन आरोपियों की ओर से जवाब दाखिल किया जाएगा और इसके बाद अदालत तय करेगी कि मामले में आगे किस प्रकार की सुनवाई होगी। संभावना जताई जा रही है कि अगली सुनवाई में अदालत मामले के तथ्यों, निचली अदालतों के फैसलों और कानूनी पहलुओं की गहन समीक्षा कर सकती है।

धनंजय सिंह की प्रतिक्रिया

हालांकि इस फैसले के बाद धनंजय सिंह की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद है। उनका मानना है कि इतने वर्षों बाद भी यदि मामले पर निष्पक्ष सुनवाई होती है, तो सच्चाई सामने आएगी। धनंजय सिंह पहले भी कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि वह न्यायिक प्रक्रिया में पूरा विश्वास रखते हैं और कानून के रास्ते ही अपने अधिकारों की रक्षा करेंगे।

राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा

इस मामले के फिर से सुर्खियों में आने के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। धनंजय सिंह एक प्रभावशाली राजनीतिक नेता रहे हैं और उनका नाम अक्सर प्रदेश की राजनीति में चर्चा में रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कदम राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। वहीं आम जनता और सामाजिक संगठनों का भी कहना है कि किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, न्याय पाने का पूरा अधिकार है, और यदि किसी को निचली अदालतों से संतोषजनक न्याय नहीं मिलता है तो सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खुला रहता है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि 22 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप अपने आप में महत्वपूर्ण है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार, यदि शीर्ष अदालत को लगता है कि निचली अदालतों के फैसलों में कोई कानूनी त्रुटि या न्यायिक चूक हुई है, तो वह मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज सकती है या स्वयं सुनवाई कर सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इतने पुराने मामले में साक्ष्यों और गवाहों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

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