मिर्जापुर के विंध्याचल मार्ग पर स्थित 176 वर्ष पुराना ऐतिहासिक ओझला पुल नवरात्रि से पहले तिरंगे की रोशनी से जगमगा उठा है। यह धरोहर इन दिनों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। पुल को विशेष रोशनी से सजाया गया है, जिससे इसकी भव्यता और बढ़ गई है। यह अनोखा पुल पहाड़ी नदी पुण्यजला और गंगा नदी के संगम स्थल पर पानी के बीच निर्मित है। इसकी विशेषता यह है कि यह चार मंजिला सराय के रूप में बना है, जिसकी छत से होकर सड़क गुजरती है। यह सड़क मीरजापुर को प्रयागराज, वाराणसी सहित कई क्षेत्रों से जोड़ती है। पत्थरों पर की गई बेजोड़ नक्काशी और प्राचीन निर्माण तकनीक इसे वास्तुकला का अद्भुत नमूना बनाती है। इस पुल का निर्माण वर्ष 1850 में नगर के प्रसिद्ध व्यापारी महंत परशुराम गिरी ने कराया था। बताया जाता है कि उस समय मीरजापुर रुई की एक बड़ी मंडी थी। एक दिन रुई के दाम बढ़ने की सूचना मिलने पर महंत परशुराम गिरी ने पूरी मंडी की रुई खरीद ली। उस व्यापार से हुई एक दिन की कमाई को उन्होंने जनहित में खर्च करते हुए इस पुल और सराय का निर्माण करवाया। पुराने समय में जलमार्ग से व्यापार और आवागमन होता था, तथा विंध्याचल जाने के लिए लोगों को नाव का सहारा लेना पड़ता था। इसी कारण व्यापारी और यात्री इस स्थान पर ठहरते थे। यात्रियों की सुविधा के लिए सराय की चारों मंजिलों पर बड़े-बड़े कमरे बनाए गए थे। पुल के खंभे षट्कोणीय आकार में निर्मित हैं, जो नदी की तेज धार को चीरते हुए पुल को मजबूती प्रदान करते हैं। यह पुल जिले के पहाड़ों से निकाले गए पत्थरों से बना है। महराबदार डिजाइन, झरोखे और घुमावदार सीढ़ियां इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। हर मंजिल पर रोशनी और हवा की प्राकृतिक व्यवस्था की गई है। सैकड़ों वर्षों से यह पुल जनसेवा करते हुए आज भी मजबूती से खड़ा है, जो मीरजापुर की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है।


