हर 65 में 1 बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित:जल्दी पहचान, सही थेरेपी से बेहतर हो सकता है बच्चों का विकास; इंदौर में हुई पैनल चर्चा

हर 65 में 1 बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित:जल्दी पहचान, सही थेरेपी से बेहतर हो सकता है बच्चों का विकास; इंदौर में हुई पैनल चर्चा

भारत में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। वर्तमान में औसतन हर 65 बच्चों में से 1 बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम से प्रभावित है, जबकि प्रति 1 हजार बच्चों में यह संख्या 12 से 15 तक बताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि केवल मामलों के बढ़ने के कारण नहीं, बल्कि बेहतर जागरूकता, समय पर स्क्रीनिंग और सटीक डायग्नोसिस के चलते भी है, जिससे पहले छूट जाने वाले केस अब सामने आ रहे हैं। यह जानकारी इंदौर ऑक्युपेशनल थैरेपिस्ट एसोसिएशन और इंडियन स्पीच एंड हियरिंग एसोसिएशन की मध्यप्रदेश शाखा द्वारा आयोजित “बिल्डिंग ब्रिजेस फॉर ऑटिज्म” विषय की पैनल चर्चा में दी गई। पैनल में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अंकिता तिवारी, साइकेट्रिस्ट डॉ. पवन राठी, पीडियाट्रिशियन डॉ. शादाब हुसैन, ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट डॉ. परेश माथुर व डॉ. सारंग पुराणिक, ऑडियोलॉजिस्ट व स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट निर्णय कुमार केसरी और गरिमा दीक्षित तथा साइकोलॉजिस्ट शिखा शाह शामिल रहे। स्क्रीन एक्सपोजर भी एक जोखिम फैक्र ऑक्युपेशनल थैरेपिस्ट डॉ. परेश माथुर ने बताया कि ऑटिज्म का कोई एक निश्चित कारण नहीं है। इसमें जेनेटिक और पर्यावरणीय दोनों कारकों की भूमिका मानी जाती है। पारिवारिक प्रवृत्ति, गर्भावस्था के दौरान की परिस्थितियां, प्रीमैच्योर जन्म और अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर जैसे कारक जोखिम बढ़ा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चे के मस्तिष्क के शुरुआती विकास में अंतर होता है। शुरुआती संकेतों पर ध्यान जरूरी एक्सपर्ट्स के अनुसार, अभिभावक बच्चों में कुछ शुरुआती लक्षण पहचान सकते हैं। जैसे नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना, आंखों से संपर्क कम करना, बोलने में देरी, दूसरों के साथ खेलने में रुचि न दिखाना या एक ही व्यवहार को बार-बार दोहराना। आवाज या रोशनी के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता भी संकेत हो सकता है। आमतौर पर ये लक्षण 2 वर्ष की उम्र के आसपास स्पष्ट होने लगते हैं। 18 से 24 महीने की उम्र स्क्रीनिंग के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। इस अवधि में व्यवहार, भाषा और सामाजिक जुड़ाव में अंतर स्पष्ट रूप से दिख सकता है। समय पर पहचान होने पर ऑक्यूपेशनल और स्पीच थेरेपी जल्दी शुरू कर बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। मल्टी-डिसिप्लिनरी अप्रोच जरूरी एक्सपर्ट्स ने जोर दिया कि हर बच्चे की जरूरत अलग होती है, इसलिए इलाज के लिए विशेषज्ञों की टीम आवश्यक है। न्यूरोलॉजिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट और स्पीच थेरेपिस्ट मिलकर काम करते हैं। जहां ऑकयुपेशनल थेरेपी बच्चे की सेंसरी, मोटर और दैनिक गतिविधियों पर कार्य करती है, वहीं स्पीच थेरेपी संचार कौशल को विकसित करती है। गलत तरीकों से बचने की सलाह चर्चा में बताया गया कि “वन-साइज-फिट्स-ऑल” अप्रोच सबसे बड़ी गलती है। बिना उचित असेसमेंट के थेरेपी शुरू करना, केवल एक ही थेरेपी पर निर्भर रहना या घर पर सही मार्गदर्शन न देना बच्चों के विकास को प्रभावित कर सकता है। यदि 3 से 6 महीने में सुधार नजर न आए, बच्चा थेरेपी के दौरान असहज महसूस करे या थेरेपिस्ट स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित न करे, तो यह संकेत हो सकते हैं कि उपचार सही दिशा में नहीं है।

​ 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *