इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रांसजेंडर और एक अन्य व्यक्ति के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को संरक्षण प्रदान करते हुए, उनके परिवार वालों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उनके जीवन में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने संविधान के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को सर्वोपरि बताते हुए, पुलिस को जरूरत पड़ने पर तत्काल सुरक्षा प्रदान करने का भी आदेश दिया है। मामला मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र से जुड़ा है। दोनों याची बालिग हैं और उन्होंने स्वेच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला लिया है। याचियों का कहना था कि परिवार से ही उनकी जान-माल को खतरा है। स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की मांग की, किंतु कोई कार्रवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट की शरण ली। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है और परिवार या समाज इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018) मामले का हवाला दिया, जिसमें समलैंगिक संबंधों को मान्यता देते हुए आईपीसी की धारा 377 समाप्त कर दिया था।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे संबंध संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन नहीं करते। साथ ही,अकांक्षा बनाम यूपी राज्य (2025) मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने पुष्टि की कि शादी न होने या शादी न कर पाने की स्थिति में भी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार सुरक्षित रहते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया: “एक बार जब कोई बालिग व्यक्ति अपना जीवन साथी चुन लेता है, तो परिवार या किसी अन्य को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है।
राज्य का कर्तव्य है कि वह हर नागरिक के जीवन स्वतंत्रता की रक्षा करे।” कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा आती है, तो वे पुलिस कमिश्नर या एसएसपी से संपर्क करें। पुलिस तुरंत सुरक्षा प्रदान करेगी। अगर दस्तावेजी सबूत न हों, तो पुलिस ऑसिफिकेशन टेस्ट या अन्य कानूनी प्रक्रिया अपनाकर उम्र सत्यापित कर सकती है। हालांकि, अगर कोई अपराध दर्ज नहीं है, तो पुलिस जबरन कोई कार्रवाई नहीं करेगी।


