एक बार छोड़ा तो पलटकर भी नहीं देखा:उज्जैन के सेवाधाम में बच्चों को अपनों का इंतजार; होठों पर मुस्कान, आंखों पर दर्द

कौन हैं ये लोग? कहां से आते हैं? फिल्म जॉली एलएलबी में एक्टर अरशद वारसी ने ये इमोशनल सवाल जज और समाज से पूछा था। सवाल फिल्म के किरदारों के बारे में था, लेकिन उज्जैन के सेवाधाम आश्रम के बच्चों के बारे में भी मन में यही सवाल बार-बार कौंधता है। यहां 17 बच्चों की मौत हो चुकी है। 25 गंभीर हैं, लेकिन सवाल वही है- कौन हैं ये लोग? कहां से आते हैं ये लोग? हमने जब इस सवाल की परतें खोलीं तो हमारा मन भी इन बच्चों की कहानी देख-सुनकर सहम गया। ये बच्चे दिव्यांग हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर ईश्वर से इसकी शिकायत भी नहीं कर सकते, क्योंकि वो बोल भी नहीं पाते। इन्हें अपनों ने भी ठुकरा दिया। एक बच्ची के पिता का नाम इंदौर के बड़े व्यापारियों के साथ इज्जत से लिया जाता है, लेकिन बच्ची को यहां छोड़ने के बाद वो ये छोटी सी बात भूल गए कि कभी उनके घर एक बच्ची पैदा भी हुई थी। ऐसे ही बच्चों की जिंदगी की परतें हमने खोलीं और ये जानने की कोशिश की कि आखिर ये बच्चे यहां तक कैसे पहुंचे? और क्या ये कभी अपने घर वापस लौट सकेंगे? सेवाधाम में 200 से ज्यादा दिव्यांग रह रहे उज्जैन शहर से करीब 16 किलोमीटर दूर गांव अंबोदिया से आगे सुनसान सड़क पर है सेवाधाम आश्रम। लोहे के बड़े दरवाजे के अंदर हरे-भरे पेड़ों के पीछे से झांकती कुछ इमारतें। यहां भी सुबह सूरज वैसे ही उगता है, जैसे शहर के बाकी हिस्सों में। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां दिन की शुरुआत दौड़ते-भागते कदमों से नहीं, बल्कि बिस्तर पर लेटी आंखों की हल्की-सी चमक से होती है। यहां 200 से अधिक बच्चे रहते हैं। अधिकांश ऐसे हैं, जिनके शरीर का निचला हिस्सा काम नहीं करता। कई मानसिक रूप से भी दिव्यांग हैं। कुछ देख नहीं सकते, कुछ सुन नहीं सकते, कुछ बोल नहीं सकते लेकिन सबकुछ महसूस करते हैं। यहां हर बिस्तर पर एक कहानी है। हर कहानी में दर्द है, पर उससे बड़ा है इनका कभी नहीं टूटने वाला धैर्य। हर बच्चे की अपनी दुनिया है- छोटी, सीमित लेकिन धड़कती और सांस लेती हुई। दवाइयों की गंध के बीच पहियों की हल्की खनक सेवाधाम आश्रम बाहर से देखने पर किसी साधारण संस्था की तरह लगता है- सादा भवन, आंगन में कुछ पेड़, बरामदे में रखी व्हीलचेयर। लेकिन जैसे ही भीतर कदम रखते हैं, एहसास होता है कि यह जगह सामान्य नहीं है। यहां दौड़ते कदमों की आवाज नहीं आती। यहां पहियों की हल्की खनक है, दवाइयों की गंध है और उन बच्चों की धीमी सांसें हैं, जो बिस्तरों पर लेटे हुए जीवन से हारने को तैयार नहीं हैं। सेवा सारथी के हाथों में जिंदगी की गाड़ी आश्रम में सुबह छह बजे से पहले ही सेवक-सेविकाएं अपने काम में लग जाते हैं। इन्हें यहां सेवा सारथी कहा जाता है। जो बच्चे खुद से करवट बदलने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें दो-दो घंटे में करवट दिलाई जाती है। बेडसोर से बचाने के लिए यह जरूरी है। कई बच्चों को नली से भोजन दिया जाता है। कुछ को हाथ से धीरे-धीरे कौर खिलाना पड़ता है। एक-एक चम्मच खिलाने में कई मिनट लग जाते हैं। यहां कोई जल्दबाजी नहीं कर सकता। हर बच्चे का शरीर अलग है, जरूरत अलग है, प्रतिक्रिया अलग है। एक सेविका बताती हैं- हम यहां समय नहीं देखते। जब तक बच्चा आराम में न आ जाए, हम उठते नहीं। उन बच्चों की कहानी, जिनकी मुस्कान के पीछे छिपा है दर्द… 1. सहज: पंद्रह दिनों का वादा, छह साल की प्रतीक्षा सेवाधाम के संचालक सुधीरभाई गोयल कहते हैं- सहज को उसके दादा पुरुषोत्तम मित्तल और दादी रेणुका मित्तल यहां छोड़ गए थे। कहा था कि पिता पिंकेश मित्तल का एक्सीडेंट हो गया है। बस पंद्रह दिन रख लीजिए। उनके लिए वह पंद्रह दिन आज तक पूरे नहीं हुए। सहज इंदौर के एक समृद्ध परिवार से है। बड़े व्यापारी घराने की बच्ची। आर्थिक अभाव नहीं था। पर जब उसके शरीर का निचला हिस्सा निष्क्रिय हुआ, परिवार के सामने कठिन देखभाल की चुनौती आई। वह यहां छोड़ गए। सहज तब छोटी थी। शायद तीन-चार साल की। उसे बिस्तर पर लिटाकर दादा-दादी ने भरोसा दिलाया था कि हम लेने आएंगे। पहले महीने सहज दरवाजे की ओर बार-बार देखती थी। दरवाजा खुलता था तो उसकी आंखें चमक उठतीं थीं। आज छह साल बाद भी उसकी आंखों में इंतजार है, लेकिन उसने अब दरवाजे की तरफ देखना छोड़ दिया है। एक सेवक बताते हैं- हमने कई बार परिवार से संपर्क करने की कोशिश की। जवाब नहीं मिला। धीरे-धीरे फोन रिसीव होना भी बंद हो गया। 2. यशोदा: चौदह साल का मौन, पर आंखें सब बोलती हैं यशोदा 2008 से सेवा आश्रम में है। वो बाल कल्याण समिति के जरिए यहां तक पहुंची थी। वह पूरी तरह शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग है। चौदह साल से बिस्तर ही उसकी दुनिया है। वह बैठ नहीं सकती। चल नहीं सकती। खुद से करवट भी नहीं बदल सकती। उसकी देखभाल में हर दिन कई घंटे लगते हैं। उसे नहलाना, कपड़े बदलना, दवा देना, खाना खिलाना, सब कुछ धैर्य और सावधानी से करना होता है। एक सेविका कहती हैं- जब हम उसका हाथ पकड़ते हैं, वह कसकर पकड़ लेती है। जैसे कह रही हो कि मत छोड़ना। यशोदा बोल नहीं सकती, पर उसकी आंखें सब कहती हैं। मंदिर की घंटी बजती है तो पलकें तेजी से झपकाती है। कोई लोरी गाता है तो चेहरे की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं- जैसे उसे शांति मिल रही हो। चौदह साल में कितने मौसम बदले। कितने त्योहार आए-गए। यशोदा को मां की गोद न मिली। हालांकि, अब उसे आश्रम में कई यशोदा मां मिल गईं हैं। 3. पुनिया: अस्पताल के वार्ड से आश्रम तक पहुंची इंदौर के एमवाय अस्पताल के एक वार्ड में दो साल की बच्ची को परिजन छोड़कर चले गए थे। डॉक्टरों ने बताया- धड़ के नीचे का हिस्सा काम नहीं करता। देखभाल लंबी और कठिन होगी। बचने की उम्मीद कम है। परिजन लौटकर नहीं आए। बच्ची को सेवा आश्रम भेजा गया। उसका नाम रखा गया-पुनिया। आज सोलह साल हो चुके हैं। पुनिया ने चलना नहीं सीखा। बैठना भी नहीं। उसका शरीर बिस्तर से बंधा है। पर उसकी आंखों में चमक है। वह मुस्कुराती है। बात भी करती है। हमने पूछा- क्या नाम है तो मुस्करा कर बोली-पुनिया। पूछा- कब से हो तो बोली- बचपन से। हमारे पास सवाल तो कई थे, लेकिन उसे देखकर पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। 4. आदर्श: खिलौने बेड के पास रखे, लेकिन पकड़ नहीं पाता नौ साल पहले बैतूल के तत्कालीन कलेक्टर शशांक मिश्रा ने एक बच्चे को सेवा आश्रम भिजवाया। बच्चे की हालत बेहद गंभीर थी। डॉक्टरों ने कहा था कि 14-15 दिन से ज्यादा नहीं जी पाएगा। उसका नाम आदर्श है। जब वह आश्रम पहुंचा, शरीर सूखा था और सांसें कमजोर। सेवकों ने दिन-रात सेवा की। पोषण, दवा, साफ-सफाई, नियमित देखभाल। धीरे-धीरे शरीर ने प्रतिक्रिया दी। सांसें स्थिर हुईं। आज नौ साल हो चुके हैं। आदर्श अभी भी चल नहीं सकता। पर उसने जिंदगी की डोर थाम रखी है। उसके बेड के पास मेडिकल टेबल पर कुछ खिलौने रखे हैं। वह उन्हें देखता है, उठाने की कोशिश भी करता है, लेकिन दिमाग का हाथों पर कंट्रोल नहीं। खिलौने वैसे ही रखे रहते हैं। सुधीरभाई गोयल को देख वह खुशी से छटपटाने लगता है, जैसे कोई अपना आया हो। सुधीरभाई उसे उठाकर कुछ देर दुलारते हैं।
5. अश्विनी: देख-बोल नहीं सकती, 12 साल से बेड पर आश्रम में ही एक पलंग अश्विनी का भी है। वो 14 साल की है। देख नहीं सकती, सुन नहीं सकती और न ही बोल सकती है। वह चल नहीं सकती और बैठ भी नहीं सकती। लेकिन धड़कनें चल रही हैं, 12 साल से। पलंग ही घर है और ऊपर ढंका कंबल ही मां का पल्लू। अश्विनी को बाल कल्याण समिति के लोग यहां छोड़ गए थे। बताते हैं कि कोई बस स्टैंड पर उसे मरने के लिए छोड़ गया था। अश्विनी के लिए हर दिन एक जैसा है। चारों तरफ अंधेरा और महसूस करने के लिए सिर्फ उन हाथों का स्पर्श, जो खाना खिलाने और उसकी सेवा में लगे सेवा सारथियों के हैं। जिनके माता-पिता हैं, वो भी देखने तक नहीं आते सेवाआश्रम के संचालक सुधीरभाई गोयल बताते हैं कि जिन बच्चो के माता-पिता नहीं हैं, उनकी सेवा हम कर रहे हैं, लेकिन जिनके माता–पिता हैं और सक्षम हैं, वे भी देखने तक नहीं आते। बच्चे अपाहिज हुए तो उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। गोयल कहते हैं कि ऐसे लोगों का समाज से बहिष्कार होना चाहिए। उन्हें जनता के सामने लाना चाहिए। ऐसे लोग मंदिरों में तो लाखों रुपए दान कर रहे हैं, लेकिन खुद के बच्चों को देखने नहीं आ रहे।

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