क्या है ऑनलाइन कोरियन गेम, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का ऐसा नशा ,जो ले रहा है बच्चों की जान

क्या है ऑनलाइन कोरियन गेम, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का ऐसा नशा ,जो ले रहा है बच्चों की जान

Mobile phone addiction: मोबाइल फोन और इंटरनेट आज के दौर में जितनी बड़ी सुविधा हैं, बच्चों के लिए ये उतने ही ज्यादा जानलेवा जाल बनते जा रहे हैं। गाजियाबाद (Ghaziabad) में तीन लड़कियों की रहस्यमयी मौत ने एक बार फिर देश और दुनिया में ‘ऑनलाइन कोरियन गेम’ (Online Korean Game) और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के दुरुपयोग पर सवालिया निशान लगा दिया है। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि हर उस घर के लिए चेतावनी है, जहां बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं।

‘मौत’ का ऑनलाइन खेल: क्या है यह कोरियन गेम ?

पुलिस जांच और साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आजकल इंटरनेट पर कई ऐसे कोरियन और विदेशी गेमिंग ऐप्स मौजूद हैं जो बच्चों के दिमाग को अपने काबू में कर लेते हैं। ये साधारण गेम नहीं होते।

ब्रेनवॉश की तकनीक

ये गेम्स ‘Role Playing’ (पात्रों का अभिनय) पर आधारित होते हैं। इनमें कोरियाई पॉप कल्चर (K-Pop) के आकर्षित करने वाले कैरेक्टर्स होते हैं। ये लड़कियां भी खुद को कोरियन राजकुमारी समझने लगी थीं।

खतरनाक टास्क है ये

शुरुआत में गेम आसान लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह बच्चों को खतरनाक ‘टास्क’ देता है। इसमें हाथ की नस काटने से लेकर छत से कूदने जैसे जानलेवा निर्देश तक शामिल हो सकते हैं।

ब्लैकमेलिंग भी हो सकती है

कई बार गेम एडमिन बच्चों की निजी जानकारी चुरा लेते हैं और गेम छोड़ने पर उन्हें ब्लैकमेल करते हैं। डर के मारे बच्चे वही करते हैं जो गेम कहता है।

गैजेट्स का दुरुपयोग

एक ‘साइलेंट किलर’ गाजियाबाद की घटना बताती है कि कैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का बिना रोक-टोक इस्तेमाल बच्चों को अवसाद (Depression) और अकेलेपन की ओर धकेल रहा है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे अब असली दुनिया से कटकर ‘वर्चुअल दुनिया’ (Virtual World) में जीने लगे हैं। जब उन्हें गेम में हार मिलती है या गेम का कोई टास्क पूरा नहीं होता, तो वे इसे अपनी निजी जिंदगी की हार मान लेते हैं। रात-रात भर जागकर गेम खेलना, परिवार से बात न करना और चिड़चिड़ा हो जाना—ये सब खतरे की घंटियां हैं।

इस मामले में क्या कहते हैं आंकड़े ?

एक हालिया सर्वे के अनुसार, भारत में 12 से 18 साल के बच्चे औसतन 6 से 8 घंटे मोबाइल पर बिता रहे हैं। डार्क वेब (Dark Web) के जरिये ऐसे कई प्रतिबंधित गेम्स बच्चों तक पहुंच रहे हैं, जो गूगल प्ले स्टोर पर भी उपलब्ध नहीं हैं। एपीके फाइल्स (APK Files) के जरिए डाउनलोड किए जाने वाले ये गेम्स बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाते हैं।

माता-पिता को डिजिटल पेरेंटिंग सीखने की जरूरत

इस दिल दहला देने वाली घटना पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के एक अधिकारी ने चिंता जताते हुए कहा, “माता-पिता को डिजिटल पेरेंटिंग सीखने की जरूरत है। आप बच्चे को फोन देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।” वहीं, साइबर सेल के डीसीपी ने कहा, “हम उस सर्वर को ट्रैक कर रहे हैं जिससे यह गेम ऑपरेट हो रहा था। संदिग्ध ऐप्स की एक लिस्ट जल्द जारी की जाएगी।”

पीयर प्रेशर और FOMO (छूट जाने का डर)

बहरहाल,आजकल बच्चों में ‘फोमो’ (Fear of Missing Out) का भारी दबाव है। अगर दोस्तों का ग्रुप कोई खास ‘कोरियन गेम’ खेल रहा है, तो बाकी बच्चे भी खुद को कूल दिखाने के लिए उसमें शामिल हो जाते हैं। यही ‘पीयर प्रेशर’ (Peer Pressure) उन्हें मौत के मुंह में धकेल रहा है। यह एक सामाजिक समस्या है जिसका हल सिर्फ पुलिस नहीं, बल्कि समाज को मिल कर निकालना होगा।

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