मिथिलांचल की पहचान केवल अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की समृद्ध परंपरा से भी रही है। ऐतिहासिक धरोहरों को वर्तमान में महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह संग्रहालय में संरक्षित कर रखा गया है। संग्रहालय की स्थापना 16 सितंबर 1979 को हुई थी। संग्रहालय में हाथी दांत से बने राजसिंहासन, महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा, हौदा, पलंग, पालकी, कुर्सियां, अलमारी, बक्सा, नगारा और सोफा सेट जैसी दुर्लभ वस्तुएं हैं। देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी लोग इन धरोहरों को देखने पहुंचते हैं। इतिहासकार रमण दत्त झा और दरभंगा राज धरोहर के जानकार कुमुद सिंह बताते हैं कि महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने नीलामी में हाथी दांत से बनी कई कलाकृतियों को खरीदकर भारत की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित किया। इनमें से तीन दुर्लभ कुर्सियां बाद में विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता को दान कर दी गईं, जबकि शेष धरोहरें दरभंगा राजमहलों की शान बनी रहीं। बाद में इन्हें संग्रहालय को सौंप दिया गया। मुर्शिदाबाद के कालाकारों से कलाकृतियां तैयार करवाई थी पुरातत्वविद शिव कुमार मिश्रा के अनुसार दरभंगा महाराज ने मुर्शिदाबाद से कुशल कलाकारों को बुलवाकर भी हाथी दांत की कई उत्कृष्ट कलाकृतियां तैयार करवाई थीं। इन कलाकृतियों पर उकेरी गई प्रतिमाएं और डिजाइन आज भी अपनी चमक और कलात्मक वैभव से लोगों को आकर्षित करती हैं।
दरभंगा में स्थित चंद्रधारी संग्रहालय भी ऐतिहासिक धरोहरों का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां हाथी दांत की दुर्लभ वस्तुओं के अलावा मुगलकालीन पेंटिंग, ताम्रपत्र पर लिखित तिरहुत और कैथी लिपि की सैकड़ों पांडुलिपियां, एक इंच की रामायण, एकमुखी रुद्राक्ष और अन्य कई अनमोल धरोहरें सुरक्षित हैं। संग्रहालय में कुल 15 गैलरियां हैं, जिनमें इतिहास और संस्कृति की अमूल्य विरासत संरक्षित है। हालांकि, एक गैलरी वर्षों से सील है, जिसके अंदर पांचजन्य शंख सहित कई दुर्लभ वस्तुएं रखी गई हैं।
महाराजा कामेश्वर सिंह संग्रहालय में शाही चीजें हैं मौजूद दरभंगा का तीसरा प्रमुख संग्रहालय महाराजा कामेश्वर सिंह संग्रहालय है, जो ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के नरगौना पैलेस परिसर में स्थित है। इस संग्रहालय में दरभंगा महाराज के समय की लिफ्ट, एयर कंडीशनर, फ्रिज और शाही जीवनशैली से जुड़ी कई वस्तुएं मौजूद हैं। 2015 में तत्कालीन कुलपति प्रो. साकेत कुशवाहा ने इसका ताला खुलवाकर इसे आम लोगों के लिए खोला था, लेकिन बाद में यह फिर बंद हो गया।
मिथिलांचल की यह धरोहरें न केवल क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि दरभंगा राज परिवार ने भारतीय इतिहास और संस्कृति को सुरक्षित रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जरूरत इस बात की है कि इन संग्रहालयों और दुर्लभ धरोहरों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार और समाज मिलकर ठोस पहल करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस गौरवशाली विरासत से परिचित हो सकें। महाराज ने निलामी में सबसे ऊंची बोली लगाई थी दरभंगा राज परिवार ने न सिर्फ अपनी विरासत को संजोया, बल्कि देश की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों को विदेश जाने से बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टाइगर ऑफ मैसूर कहे जाने वाले टीपू सुल्तान की धरोहरों का संरक्षण है। इतिहासकारों के अनुसार 1889 में लंदन के प्रसिद्ध बोनहम्स नीलामी घर में टीपू सुल्तान से जुड़ी कई दुर्लभ वस्तुओं की नीलामी की जा रही थी। उस समय दरभंगा महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने देश की ऐतिहासिक शान को बचाने के उद्देश्य से नीलामी में भाग लिया और सबसे ऊंची बोली लगाकर कई धरोहरों को दूसरे देशों में जाने से रोक लिया। इन धरोहरों में हाथी दांत से निर्मित अद्भुत कलाकृतियां प्रमुख थीं, जो आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। मिथिलांचल की पहचान केवल अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की समृद्ध परंपरा से भी रही है। ऐतिहासिक धरोहरों को वर्तमान में महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह संग्रहालय में संरक्षित कर रखा गया है। संग्रहालय की स्थापना 16 सितंबर 1979 को हुई थी। संग्रहालय में हाथी दांत से बने राजसिंहासन, महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा, हौदा, पलंग, पालकी, कुर्सियां, अलमारी, बक्सा, नगारा और सोफा सेट जैसी दुर्लभ वस्तुएं हैं। देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी लोग इन धरोहरों को देखने पहुंचते हैं। इतिहासकार रमण दत्त झा और दरभंगा राज धरोहर के जानकार कुमुद सिंह बताते हैं कि महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने नीलामी में हाथी दांत से बनी कई कलाकृतियों को खरीदकर भारत की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित किया। इनमें से तीन दुर्लभ कुर्सियां बाद में विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता को दान कर दी गईं, जबकि शेष धरोहरें दरभंगा राजमहलों की शान बनी रहीं। बाद में इन्हें संग्रहालय को सौंप दिया गया। मुर्शिदाबाद के कालाकारों से कलाकृतियां तैयार करवाई थी पुरातत्वविद शिव कुमार मिश्रा के अनुसार दरभंगा महाराज ने मुर्शिदाबाद से कुशल कलाकारों को बुलवाकर भी हाथी दांत की कई उत्कृष्ट कलाकृतियां तैयार करवाई थीं। इन कलाकृतियों पर उकेरी गई प्रतिमाएं और डिजाइन आज भी अपनी चमक और कलात्मक वैभव से लोगों को आकर्षित करती हैं।
दरभंगा में स्थित चंद्रधारी संग्रहालय भी ऐतिहासिक धरोहरों का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां हाथी दांत की दुर्लभ वस्तुओं के अलावा मुगलकालीन पेंटिंग, ताम्रपत्र पर लिखित तिरहुत और कैथी लिपि की सैकड़ों पांडुलिपियां, एक इंच की रामायण, एकमुखी रुद्राक्ष और अन्य कई अनमोल धरोहरें सुरक्षित हैं। संग्रहालय में कुल 15 गैलरियां हैं, जिनमें इतिहास और संस्कृति की अमूल्य विरासत संरक्षित है। हालांकि, एक गैलरी वर्षों से सील है, जिसके अंदर पांचजन्य शंख सहित कई दुर्लभ वस्तुएं रखी गई हैं।
महाराजा कामेश्वर सिंह संग्रहालय में शाही चीजें हैं मौजूद दरभंगा का तीसरा प्रमुख संग्रहालय महाराजा कामेश्वर सिंह संग्रहालय है, जो ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के नरगौना पैलेस परिसर में स्थित है। इस संग्रहालय में दरभंगा महाराज के समय की लिफ्ट, एयर कंडीशनर, फ्रिज और शाही जीवनशैली से जुड़ी कई वस्तुएं मौजूद हैं। 2015 में तत्कालीन कुलपति प्रो. साकेत कुशवाहा ने इसका ताला खुलवाकर इसे आम लोगों के लिए खोला था, लेकिन बाद में यह फिर बंद हो गया।
मिथिलांचल की यह धरोहरें न केवल क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि दरभंगा राज परिवार ने भारतीय इतिहास और संस्कृति को सुरक्षित रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जरूरत इस बात की है कि इन संग्रहालयों और दुर्लभ धरोहरों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार और समाज मिलकर ठोस पहल करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस गौरवशाली विरासत से परिचित हो सकें। महाराज ने निलामी में सबसे ऊंची बोली लगाई थी दरभंगा राज परिवार ने न सिर्फ अपनी विरासत को संजोया, बल्कि देश की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों को विदेश जाने से बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टाइगर ऑफ मैसूर कहे जाने वाले टीपू सुल्तान की धरोहरों का संरक्षण है। इतिहासकारों के अनुसार 1889 में लंदन के प्रसिद्ध बोनहम्स नीलामी घर में टीपू सुल्तान से जुड़ी कई दुर्लभ वस्तुओं की नीलामी की जा रही थी। उस समय दरभंगा महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने देश की ऐतिहासिक शान को बचाने के उद्देश्य से नीलामी में भाग लिया और सबसे ऊंची बोली लगाकर कई धरोहरों को दूसरे देशों में जाने से रोक लिया। इन धरोहरों में हाथी दांत से निर्मित अद्भुत कलाकृतियां प्रमुख थीं, जो आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।


