डॉ. प्रेम कुमार कुमार और हम 5 दोस्त पहले RSS से जुड़े, फिर विद्यार्थी परिषद में आए। जयप्रकाश नारायण से प्रेरित होकर 1974 में आंदोलन में कूद पड़े और पकड़े गए। जिसके बाद हम पांचों जेल भेजे गए। जेल में रहते प्रेम के पिता का देहांत हो गया। वे अंतिम संस्कार में भी नहीं जा सके। यह उनके जीवन का सबसे पीड़ादायक क्षण था। जेल में ही पांचों ने तय किया कि बाहर निकलेंगे तो दवा का बिजनेस करेंगे। जेल से छूटने के बाद हमने बिजनेस शुरू किया। डॉ. प्रेम कुमार के दोस्त अनिल कुमार ने भास्कर से बातचीत में ये पुरानी बातें रखी हैं। वहीं, एक दोस्त कहते हैं कि प्रेम को भूंजा काफी पसंद है। जब भी उन्हें सिनेमा हॉल बुलाते थे तो वे हमेशा इंटरवल के वक्त पहुंचे थे। डॉ. प्रेम कुमार के दोस्तों ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष के बारे में और क्या कहा पढ़िए रिपोर्ट… पहले देखें स्पीकर चुने जाने के बाद की तस्वीरें… बचपन के दोस्त बोले, प्रेम ने कभी किसी का नुकसान नहीं किया बचपन के दोस्त अनिल बताते हैं कि दवा के कारोबार को हमने बढ़ाने के लिए काफी मेहनत की। ईमानदारी और भरोसे से हमारा व्यवसाय काफी आगे बढ़ा। हमारी आमदनी अच्छी होने लगी। इस बीच प्रेम कुमार राजनीति से जुड़े रहे। टिकट मिला, जीतते गए और आज भी जीतते जा रहे हैं। इसकी वजह उनकी विनम्रता, सरल स्वभाव और मिलनसार व्यवहार है। उन्होंने कभी किसी का नुकसान नहीं किया। दोस्तों का मान रखने के लिए सिनेमा देख लेते थे प्रेम एक अन्य करीबी दोस्त प्रभात सिन्हा कहते हैं कि प्रेम की आदत थी, वे जहां भी जाते थे अपने साथ भूंजा भी लेकर चलते थे। उन्हें भूंजा बहुत ज्यादा पसंद है। आज भी बड़े चाव से वे खाते हैं और अपने लोगों को भी खिलाते हैं। हम दोस्त जब फिल्म देखने जाते थे तो प्रेम का भी टिकट ले लिया करते थे। प्रेम को हम बोलते थे कि समय पर पहुंच जाना, लेकिन वे कभी समय पर नहीं आते थे। इंटरवल में बड़े ही शांति से वे हमारे बगल में बैठ जाते थे। हमें पता भी नहीं चलता था कि वे कब आएं। जब गेटकीपर टॉर्च जलाता था, तब पता चलता था कि प्रेम कुमार तो आ चुके हैं। दरअसल उन्हें फिल्में देखने का कोई शौक नहीं था, लेकिन दोस्तों का मान रखने के लिए वे इंटरवल में ही सही, आ जरूर जाते थे। कर्मठता ने प्रेम को स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचाया प्रभात कहते हैं कि लोग हंसते थे। कहते थे कि 5 पार्टनर है, नहीं चलेगा बिजनस, पर हम चले और खूब चले। हमारे बीच जाति का कभी सवाल नहीं उठा। तीन कायस्थ, एक जैन और प्रेम कुमार चन्द्रवंशी समाज से थे। कभी मन में फर्क नहीं आया। यह सब प्रेम कुमार की सहजता और सरल स्वभाव की वजह से संभव था। प्रेम कुमार की यही कर्मठता उन्हें आज स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचाया। 9वीं बार विधायक चुने गए गयाजी नगर सीट से भाजपा के डॉ. प्रेम कुमार 9वीं बार विधायक चुने गए हैं। अब वे बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी बन गए हैं। डॉ. प्रेम कुमार की राजनीतिक सफर जितना लंबा है, उतनी ही दिलचस्प उनकी कहानी है। पांच दोस्तों के साथ बिजनेस शुरू किया, लेकिन उनका मन राजनीति में ही बसता था। यही लगन उन्हें 1990 में पहली बार विधानसभा पहुंचा लाई। तब से लेकर आज तक वे हर चुनाव जीतते आए हैं। कई विभागों के मंत्री भी रहे। डॉ. प्रेम कुमार कुमार और हम 5 दोस्त पहले RSS से जुड़े, फिर विद्यार्थी परिषद में आए। जयप्रकाश नारायण से प्रेरित होकर 1974 में आंदोलन में कूद पड़े और पकड़े गए। जिसके बाद हम पांचों जेल भेजे गए। जेल में रहते प्रेम के पिता का देहांत हो गया। वे अंतिम संस्कार में भी नहीं जा सके। यह उनके जीवन का सबसे पीड़ादायक क्षण था। जेल में ही पांचों ने तय किया कि बाहर निकलेंगे तो दवा का बिजनेस करेंगे। जेल से छूटने के बाद हमने बिजनेस शुरू किया। डॉ. प्रेम कुमार के दोस्त अनिल कुमार ने भास्कर से बातचीत में ये पुरानी बातें रखी हैं। वहीं, एक दोस्त कहते हैं कि प्रेम को भूंजा काफी पसंद है। जब भी उन्हें सिनेमा हॉल बुलाते थे तो वे हमेशा इंटरवल के वक्त पहुंचे थे। डॉ. प्रेम कुमार के दोस्तों ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष के बारे में और क्या कहा पढ़िए रिपोर्ट… पहले देखें स्पीकर चुने जाने के बाद की तस्वीरें… बचपन के दोस्त बोले, प्रेम ने कभी किसी का नुकसान नहीं किया बचपन के दोस्त अनिल बताते हैं कि दवा के कारोबार को हमने बढ़ाने के लिए काफी मेहनत की। ईमानदारी और भरोसे से हमारा व्यवसाय काफी आगे बढ़ा। हमारी आमदनी अच्छी होने लगी। इस बीच प्रेम कुमार राजनीति से जुड़े रहे। टिकट मिला, जीतते गए और आज भी जीतते जा रहे हैं। इसकी वजह उनकी विनम्रता, सरल स्वभाव और मिलनसार व्यवहार है। उन्होंने कभी किसी का नुकसान नहीं किया। दोस्तों का मान रखने के लिए सिनेमा देख लेते थे प्रेम एक अन्य करीबी दोस्त प्रभात सिन्हा कहते हैं कि प्रेम की आदत थी, वे जहां भी जाते थे अपने साथ भूंजा भी लेकर चलते थे। उन्हें भूंजा बहुत ज्यादा पसंद है। आज भी बड़े चाव से वे खाते हैं और अपने लोगों को भी खिलाते हैं। हम दोस्त जब फिल्म देखने जाते थे तो प्रेम का भी टिकट ले लिया करते थे। प्रेम को हम बोलते थे कि समय पर पहुंच जाना, लेकिन वे कभी समय पर नहीं आते थे। इंटरवल में बड़े ही शांति से वे हमारे बगल में बैठ जाते थे। हमें पता भी नहीं चलता था कि वे कब आएं। जब गेटकीपर टॉर्च जलाता था, तब पता चलता था कि प्रेम कुमार तो आ चुके हैं। दरअसल उन्हें फिल्में देखने का कोई शौक नहीं था, लेकिन दोस्तों का मान रखने के लिए वे इंटरवल में ही सही, आ जरूर जाते थे। कर्मठता ने प्रेम को स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचाया प्रभात कहते हैं कि लोग हंसते थे। कहते थे कि 5 पार्टनर है, नहीं चलेगा बिजनस, पर हम चले और खूब चले। हमारे बीच जाति का कभी सवाल नहीं उठा। तीन कायस्थ, एक जैन और प्रेम कुमार चन्द्रवंशी समाज से थे। कभी मन में फर्क नहीं आया। यह सब प्रेम कुमार की सहजता और सरल स्वभाव की वजह से संभव था। प्रेम कुमार की यही कर्मठता उन्हें आज स्पीकर की कुर्सी तक पहुंचाया। 9वीं बार विधायक चुने गए गयाजी नगर सीट से भाजपा के डॉ. प्रेम कुमार 9वीं बार विधायक चुने गए हैं। अब वे बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी बन गए हैं। डॉ. प्रेम कुमार की राजनीतिक सफर जितना लंबा है, उतनी ही दिलचस्प उनकी कहानी है। पांच दोस्तों के साथ बिजनेस शुरू किया, लेकिन उनका मन राजनीति में ही बसता था। यही लगन उन्हें 1990 में पहली बार विधानसभा पहुंचा लाई। तब से लेकर आज तक वे हर चुनाव जीतते आए हैं। कई विभागों के मंत्री भी रहे।


