मां ने ईंट-गारा ढोया पर छूटने नहीं दी पढ़ाई, बेटी ने भी रखा मान, प्रदेश में किया टॉप

मां ने ईंट-गारा ढोया पर छूटने नहीं दी पढ़ाई, बेटी ने भी रखा मान, प्रदेश में किया टॉप

Rama Ghodeshwar- मां तू ही कल्याणी…. एमपी के बालाघाट जिले के कटंगी क्षेत्र के टूईयापार गांव की रमा घोड़ेश्वर ने इसे सार्थक किया है। उनका संघर्ष मदर्स डे पर प्रेरणा की मिसाल बन गया है। वर्ष 2020 में पहले पति और फिर बड़ी बेटी की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया था। आर्थिक संकट पहले से था, लेकिन रमा ने हालात के सामने हार नहीं मानी। उन्होंने मजदूरी शुरू की। कभी लोगों के घरों में खाना बनाया तो कभी निर्माण कार्य में ईंट- गारा ढोया। कई बार दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया, लेकिन उन्होंने बेटियों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। बेटी ने भी अपनी मां के संघर्ष और जज्बे का मान रखा। अथक मेहनत के बल पर प्रदेश में टॉप किया।

रमा घोड़ेश्वर सपरिवार हंसी खुशी से रह रही थीं। पति, तीन बेटियों और बेटे के साथ जीवन गुजर रहा था कि अचानक दुखों का पहाड़ टूटा। दो साल पहले अचानक पति की मौत हो गई जिसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनपर आ गई। हालांकि उन्होंने बच्चों की पढ़ाई नहीं छूटने दी और तेंदूपत्ता की बीड़ी बनाकर पालन पोषण किया।

परिवार में दो मौतों के बावजूद रमा ने हिम्मत नहीं हारी। खुद को दुखों से ऊपर कर बेटियों के जीवन को संवारने को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया और इसके लिए समर्पित हो गई। बेटियों के पालन पोषण और अध्ययन के लिए हर काम किया। रमा को अपनी बेटियों पर पूरा भरोसा था कि वे कुछ अच्छा करेंगी। ऐसा हुआ भी, बेटी के कारण प्रदेश स्तर पर उनका और गांव का नाम रोशन हो गया, अब वह पूरे जिले में चर्चा के केंद्र में है।

रमा की छोटी बेटी अक्षरा ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करते हुए पूरे प्रदेश में दूसरा स्थान हासिल किया। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की इस छात्रा ने 500 में से 498 अंक प्राप्त कर अपने स्कूल, गांव और जिले का नाम रोशन कर दिया है। उनकी इस उपलब्धि से पूरे क्षेत्र में गर्व और खुशी का माहौल है वहीं मां रमा का संघर्ष सफल हो गया।

मां के संघर्ष का ही परिणाम है कि बेटी अक्षरा ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में प्रदेश में दूसरा स्थान हासिल कर पूरे जिले का नाम रोशन किया। अक्षरा बताती हैं कि मां को मजदूरी करते देखकर उन्हें और मेहनत करने की प्रेरणा मिलती थी। अब वह डॉक्टर बनकर मां के संघर्ष को सफल बनाना चाहती हैं। उन्होंने इतने दुख सहे लेकिन मजदूरी कर हमको पढ़ाया।

उनकी दुनिया अब सिर्फ बेटियों के सपनों में

इधर रमा का कहना कि उनकी दुनिया अब सिर्फ बेटियों के सपनों में बसती है। वे कहती हैं कि अक्षरा की कामयाबी पर उन्हें इतनी खुशी हुई कि इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

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