बक्सर के चौसा प्रखंड के रामपुर पंचायत के डेवी डीहरा गांव में ऐसा फैसला लिया गया, जिसने पूरे जिले में इंसानियत और भाईचारे की नई मिसाल पेश कर दी है। अपने इकलौते सहारे को खो चुके एक हिंदू परिवार ने बेटे की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए मुस्लिम समाज को एक बीघा जमीन कब्रिस्तान के लिए दान कर दी। इस कदम की पूरे जिले में चर्चा है। सड़क हादसे ने तोड़ दिया परिवार का सहारा 18 नवंबर को देहरादून में हुए सड़क हादसे में जनार्दन सिंह के 25 वर्षीय बड़े बेटे शिवम कुमार की मौत हो गई। शिवम देहरादून में अपनी मेहनत से तीन फैक्ट्रियां चला रहा था और परिवार उसकी शादी की तैयारी में जुटा था। अचानक मिली मृत्यु की खबर से पूरा परिवार सदमे में है। युवक था समाजसेवी और संस्कारी शिवम के चाचा बृजराज सिंह बताते हैं कि शिवम जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहता था। गांव–समाज में उसकी पहचान एक संस्कारी और सहयोगी युवक के रूप में थी। अपनी कमाई से वह कई लोगों की सहायता करता था। उसकी मौत ने पूरे गांव को हिला दिया है। श्राद्ध के दिन लिया गया बड़ा फैसला सोमवार को आयोजित श्राद्ध कार्यक्रम में पिता जनार्दन सिंह ने बेटे की याद को प्रेरणा में बदलते हुए मुस्लिम समाज को एक बीघा जमीन दफनाने के लिए दान दे दी। इस जमीन का नाम शिवम उर्फ अहीर धाम कब्रिस्तान रखा जाएगा। परिवार के अनुसार, शिवम की सोच हमेशा आपसी प्रेम और सौहार्द की रही, और इस निर्णय से उसी विचार को आगे बढ़ाया गया है। गांव के मुस्लिम परिवारों के पास नहीं थी दफनाने की जगह गांव में करीब 50 मुस्लिम परिवार रहते हैं, लेकिन दफनाने के लिए कोई निर्धारित भूमि नहीं थी। किसी की मौत होने पर शव को दूसरे गांव ले जाना पड़ता था। कई बार विवाद की स्थिति भी बनती थी।कुछ लोग नदी–नाले किनारे दफनाने को मजबूर थे। परिवार ने इस पीड़ा को समझते हुए जमीन दान करने का निर्णय लिया, ताकि मरने के बाद कम से कम दो गज शांति की जमीन मिल सके। श्राद्ध के मौके पर परिवार ने शिवम की याद में पौधा रोपण भी किया। पढ़ा-लिखा, आगे बढ़ने की सोच वाला था शिवम शिवम ने आईटी से बीटेक और एमबीए किया था। उसका सपना था कि बिहार के युवाओं को रोजगार मिले और राज्य आगे बढ़े। छठ पर्व पर उसने गांव की सभी छठ व्रती महिलाओं को सूप, नारियल और साड़ी भी बांटी थी।पिता कहते हैं, शिवम सिर्फ हमारा बेटा नहीं, पूरे गांव का बेटा था। अस्पताल समय पर मिलता तो शायद बेटा बच जाता दुख से भरे पिता जनार्दन सिंह ने कहा, एक पिता पर क्या बीत रही है, शब्दों में नहीं बता सकता। भगवान ऐसा दुख किसी को न दे।”उन्होंने सड़क हादसों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए।उनका कहना है, सड़क जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी हर 20KM पर एम्बुलेंस की व्यवस्था भी है। जिले में मिसाल बना परिवार का फैसला डेवी डीहरा गांव का यह कदम जिले भर में चर्चा का विषय बन गया है। लोग जनार्दन सिंह और उनके परिवार को सलाम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश है कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। शिवम की याद, मानवता की छाया परिवार का कहना है कि शिवम का सपना अधूरा रह गया, लेकिन वे उसके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहेंगे।यह कहानी एक ऐसे परिवार की है जिसने अपने भीतर के दुख को किसी दूसरे की राहत में बदल दिया। यही है असली इंसानियत, यही है असली धर्म। बक्सर के चौसा प्रखंड के रामपुर पंचायत के डेवी डीहरा गांव में ऐसा फैसला लिया गया, जिसने पूरे जिले में इंसानियत और भाईचारे की नई मिसाल पेश कर दी है। अपने इकलौते सहारे को खो चुके एक हिंदू परिवार ने बेटे की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए मुस्लिम समाज को एक बीघा जमीन कब्रिस्तान के लिए दान कर दी। इस कदम की पूरे जिले में चर्चा है। सड़क हादसे ने तोड़ दिया परिवार का सहारा 18 नवंबर को देहरादून में हुए सड़क हादसे में जनार्दन सिंह के 25 वर्षीय बड़े बेटे शिवम कुमार की मौत हो गई। शिवम देहरादून में अपनी मेहनत से तीन फैक्ट्रियां चला रहा था और परिवार उसकी शादी की तैयारी में जुटा था। अचानक मिली मृत्यु की खबर से पूरा परिवार सदमे में है। युवक था समाजसेवी और संस्कारी शिवम के चाचा बृजराज सिंह बताते हैं कि शिवम जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहता था। गांव–समाज में उसकी पहचान एक संस्कारी और सहयोगी युवक के रूप में थी। अपनी कमाई से वह कई लोगों की सहायता करता था। उसकी मौत ने पूरे गांव को हिला दिया है। श्राद्ध के दिन लिया गया बड़ा फैसला सोमवार को आयोजित श्राद्ध कार्यक्रम में पिता जनार्दन सिंह ने बेटे की याद को प्रेरणा में बदलते हुए मुस्लिम समाज को एक बीघा जमीन दफनाने के लिए दान दे दी। इस जमीन का नाम शिवम उर्फ अहीर धाम कब्रिस्तान रखा जाएगा। परिवार के अनुसार, शिवम की सोच हमेशा आपसी प्रेम और सौहार्द की रही, और इस निर्णय से उसी विचार को आगे बढ़ाया गया है। गांव के मुस्लिम परिवारों के पास नहीं थी दफनाने की जगह गांव में करीब 50 मुस्लिम परिवार रहते हैं, लेकिन दफनाने के लिए कोई निर्धारित भूमि नहीं थी। किसी की मौत होने पर शव को दूसरे गांव ले जाना पड़ता था। कई बार विवाद की स्थिति भी बनती थी।कुछ लोग नदी–नाले किनारे दफनाने को मजबूर थे। परिवार ने इस पीड़ा को समझते हुए जमीन दान करने का निर्णय लिया, ताकि मरने के बाद कम से कम दो गज शांति की जमीन मिल सके। श्राद्ध के मौके पर परिवार ने शिवम की याद में पौधा रोपण भी किया। पढ़ा-लिखा, आगे बढ़ने की सोच वाला था शिवम शिवम ने आईटी से बीटेक और एमबीए किया था। उसका सपना था कि बिहार के युवाओं को रोजगार मिले और राज्य आगे बढ़े। छठ पर्व पर उसने गांव की सभी छठ व्रती महिलाओं को सूप, नारियल और साड़ी भी बांटी थी।पिता कहते हैं, शिवम सिर्फ हमारा बेटा नहीं, पूरे गांव का बेटा था। अस्पताल समय पर मिलता तो शायद बेटा बच जाता दुख से भरे पिता जनार्दन सिंह ने कहा, एक पिता पर क्या बीत रही है, शब्दों में नहीं बता सकता। भगवान ऐसा दुख किसी को न दे।”उन्होंने सड़क हादसों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए।उनका कहना है, सड़क जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी हर 20KM पर एम्बुलेंस की व्यवस्था भी है। जिले में मिसाल बना परिवार का फैसला डेवी डीहरा गांव का यह कदम जिले भर में चर्चा का विषय बन गया है। लोग जनार्दन सिंह और उनके परिवार को सलाम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश है कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। शिवम की याद, मानवता की छाया परिवार का कहना है कि शिवम का सपना अधूरा रह गया, लेकिन वे उसके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहेंगे।यह कहानी एक ऐसे परिवार की है जिसने अपने भीतर के दुख को किसी दूसरे की राहत में बदल दिया। यही है असली इंसानियत, यही है असली धर्म।


