इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 में प्रयागराज के मांडा थानाक्षेत्र के दयाशंकर तिवारी हत्याकांड के सभी चार आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों पर लगाए आरोप संदेश से परे साबित करने में नाकाम रहा है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा एवं न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की खंडपीठ ने दिया है। उम्र कैद की सज़ा पाए कमलेश तिवारी, राकेश तिवारी, नागेश्वर तिवारी और वेद मणि तिवारी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामले के तथ्यों के अनुसार 17 दिसंबर 2010 को दया शंकर तिवारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जबकि उनका बेटा विधान चंद्र तिवारी गोली लगने से घायल हो गया था। अभियोजन पक्ष की ओर से घायल गवाह विधान चंद्र ने अपनी गवाही में दावा किया था कि आरोपियों ने चुनावी रंजिश के कारण उनके घर में घुसकर हमला किया था। उन्होंने कहा कि गोली लगने के बाद दया शंकर तिवारी व विधान चंद्र तिवारी घर के भीतर गैलरी में गिर गए थे और उनके शरीर से काफी खून निकलकर फर्श पर फैल गया था। दावा किया कि खून लगने के कारण उसने अपनी जैकेट भी उतार दी थी। हालांकि मामले की जांच करने वाले पहले विवेचक ने अदालत के समक्ष गवाही में इस दावे का खंडन किया। विवेचक ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान घर के अंदर गोली चलने का कोई निशान या दीवारों या छतों पर अंधाधुंध फायरिंग का कोई चिन्ह नहीं पाया। इसके विपरीत उसने बताया कि घटनास्थल के नक्शे में केवल एक स्थान पर खून मिला था, जिसे उसने शिकायतकर्ता के घर से 60 कदम दक्षिण की ओर स्थित बताया। विवेचक ने यह भी स्वीकार किया कि उसने घर के अंदर से खून का कोई नमूना नहीं लिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस विरोधाभास को अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर करने वाला एक बड़ा कारण माना। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष घटना के वास्तविक स्थान को स्थापित करने में बुरी तरह विफल रहा है। गवाहों ने दावा किया कि घटना घर के अंदर हुई जबकि विवेचक के बयान और साइट प्लान के अनुसार घटना घर से काफी दूर हुई थी और खून के दाग भी वास्तव में घर के बाहर पाए गए थे। इन विरोधाभासों पर संदेह का लाभ देते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर दिया और आरोपी कमलेश तिवारी, राकेश तिवारी, नागेश्वर तिवारी और वेद मणि तिवारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।


