धनबाद रिंग रोड घोटाला; मुआवजा नहीं मिला:इलाज के अभाव में आदिवासी रैयत की मौत, 15 साल बाद भी नहीं मिला मुआवजा

धनबाद रिंग रोड घोटाला; मुआवजा नहीं मिला:इलाज के अभाव में आदिवासी रैयत की मौत, 15 साल बाद भी नहीं मिला मुआवजा

धनबाद के बहुचर्चित रिंग रोड घोटाले ने एक बार फिर व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। घनसार थाना क्षेत्र के दुहाटांड आदिवासी टोला निवासी आदिवासी रैयत रसिक मुर्मू का रविवार को इलाज के अभाव में निधन हो गया। रिंग रोड परियोजना के लिए अधिग्रहित उनकी 25 डिसमिल जमीन का मुआवजा आज तक उन्हें नहीं मिल पाया। वर्ष 2011 में दर्जनों आदिवासी परिवारों की जमीन रिंग रोड के लिए अधिग्रहित की गई थी। आरोप है कि बिचौलियों ने फर्जी कागजात तैयार कर वास्तविक रैयतों की जगह अपने नाम से मुआवजे की राशि निकाल ली। रसिक मुर्मू को करीब 54 लाख रुपये का मुआवजा मिलना था, लेकिन एक-एक रुपए के लिए वे वर्षों तक दर-दर भटकते रहे। एसीबी ने की कार्रवाई, पर नहीं मिला पैसा इस पूरे मामले को समाजसेवी रमेश राही ने साल 2016 में उजागर करते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। लंबी जांच के बाद हाल ही में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई की। रिंग रोड घोटाले में नामजद 34 आरोपियों में से 17 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। इसके बावजूद पीड़ित आदिवासी रैयतों को उनका मुआवजा अब तक नहीं मिल सका है। मृतक के भतीजे शहदेव मुर्मू ने बताया कि जमीन अधिग्रहण के बाद से उनके चाचा लगातार न्याय की गुहार लगाते रहे। कई बार आंदोलन भी किया गया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। पैसों की कमी के कारण समय पर इलाज नहीं हो सका और अंततः रसिक मुर्मू की जान चली गई। मुआवजा दिलाने की मांग तेज समाजसेवी रमेश राही ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार आदिवासियों के हितैषी होने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। झारखंड में आदिवासियों को उनका संवैधानिक हक नहीं मिल पाता और बिचौलिए इसका फायदा उठाकर करोड़ों रुपए डकार जाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर समय पर रसिक मुर्मू को उनकी जमीन का मुआवजा मिल गया होता तो शायद आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। रमेश राही ने सरकार से मांग की है कि घोटाले में गबन की गई पूरी राशि जल्द से जल्द वसूल कर पीड़ित रैयतों को दी जाए, ताकि पैसों के अभाव में किसी और गरीब आदिवासी की जान न जाए। धनबाद के बहुचर्चित रिंग रोड घोटाले ने एक बार फिर व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। घनसार थाना क्षेत्र के दुहाटांड आदिवासी टोला निवासी आदिवासी रैयत रसिक मुर्मू का रविवार को इलाज के अभाव में निधन हो गया। रिंग रोड परियोजना के लिए अधिग्रहित उनकी 25 डिसमिल जमीन का मुआवजा आज तक उन्हें नहीं मिल पाया। वर्ष 2011 में दर्जनों आदिवासी परिवारों की जमीन रिंग रोड के लिए अधिग्रहित की गई थी। आरोप है कि बिचौलियों ने फर्जी कागजात तैयार कर वास्तविक रैयतों की जगह अपने नाम से मुआवजे की राशि निकाल ली। रसिक मुर्मू को करीब 54 लाख रुपये का मुआवजा मिलना था, लेकिन एक-एक रुपए के लिए वे वर्षों तक दर-दर भटकते रहे। एसीबी ने की कार्रवाई, पर नहीं मिला पैसा इस पूरे मामले को समाजसेवी रमेश राही ने साल 2016 में उजागर करते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। लंबी जांच के बाद हाल ही में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई की। रिंग रोड घोटाले में नामजद 34 आरोपियों में से 17 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। इसके बावजूद पीड़ित आदिवासी रैयतों को उनका मुआवजा अब तक नहीं मिल सका है। मृतक के भतीजे शहदेव मुर्मू ने बताया कि जमीन अधिग्रहण के बाद से उनके चाचा लगातार न्याय की गुहार लगाते रहे। कई बार आंदोलन भी किया गया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। पैसों की कमी के कारण समय पर इलाज नहीं हो सका और अंततः रसिक मुर्मू की जान चली गई। मुआवजा दिलाने की मांग तेज समाजसेवी रमेश राही ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार आदिवासियों के हितैषी होने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। झारखंड में आदिवासियों को उनका संवैधानिक हक नहीं मिल पाता और बिचौलिए इसका फायदा उठाकर करोड़ों रुपए डकार जाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर समय पर रसिक मुर्मू को उनकी जमीन का मुआवजा मिल गया होता तो शायद आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। रमेश राही ने सरकार से मांग की है कि घोटाले में गबन की गई पूरी राशि जल्द से जल्द वसूल कर पीड़ित रैयतों को दी जाए, ताकि पैसों के अभाव में किसी और गरीब आदिवासी की जान न जाए।  

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