बालाघाट जिला अस्पताल में 20 दिनों के भीतर दो शिशुओं की मौत के मामले सामने आया है। इसके बाद से ही जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लोगों में नाराजगी है। इन घटनाओं में 11 नवंबर को समय पर ऑपरेशन न होने और 1 दिसंबर को प्रसूता महिला का ऑपरेशन ड्यूटी खत्म होने का हवाला देकर डॉ. रश्मि बाघमारे द्वारा न किए जाने से गर्भस्थ शिशु की मौत के आरोप शामिल हैं। सीएचएमओ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दी सफाई मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचएमओ) डॉ. परेश उपलप ने प्रेस को अपनी सफाई दी है। उन्होंने 1 दिसंबर की घटना के बारे में बताया कि एक प्रसूता को सुबह 4 बजे भारी रक्तस्राव की शिकायत के साथ 6:55 बजे जिला अस्पताल के ट्रॉमा यूनिट के प्रसव वार्ड में भर्ती कराया गया था। उस समय मां के गर्भ में भ्रूण की कोई हलचल नहीं थी। सुबह 7 बजे डॉ. रश्मि बाघमारे ने प्रसूता की जांच की। उन्होंने महसूस किया कि भ्रूण के दिल की कोई आवाज नहीं आ रही थी, जिससे उन्हें आशंका हुई कि बच्चे की गर्भाशय के अंदर ही मौत हो चुकी है। डॉ. बाघमारे ने आशा कार्यकर्ता, प्रसूता और उसके रिश्तेदारों को स्थिति समझाई, और सभी को यकीन हो गया था कि बच्चा गर्भ में मृत है। सीएचएमओ बोले- समय पर ऑपरेशन न होने से शिशु की मौत का आरोप गलत डॉ. रश्मि बाघमारे सिजेरियन ऑपरेशन करने के लिए तैयार थीं, लेकिन भारी रक्तस्राव के कारण उन्होंने पहले रक्त की व्यवस्था करने को कहा। जब तक रक्त की व्यवस्था हुई, डॉ. बाघमारे की ड्यूटी खत्म हो चुकी थी और डॉ. श्रद्धा बारमाटे ड्यूटी पर आ चुकी थीं। इसके बाद डॉ. बारमाटे ने महिला का सिजेरियन किया और सुबह 10:30 बजे मृत शिशु को निकाला। डॉ. उपलप ने इस बात पर जोर दिया कि समय पर ऑपरेशन न होने से शिशु की मौत का आरोप गलत है। उन्होंने यह भी बताया कि आशा कार्यकर्ता डॉक्टरों के साथ अनावश्यक बहस कर रही थीं। सीएचएमओ ने डॉ. रश्मि बाघमारे को दी क्लीनचिट हालांकि, सीएचएमओ के बयान में “यकीन”, “महसूस” और “शायद” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि जिला अस्पताल और संबंधित डॉक्टर पर गंभीर आरोप लगने के बावजूद, कोई औपचारिक जांच नहीं की गई। चर्चा के दौरान सीएचएमओ ने डॉ. रश्मि बाघमारे को क्लीनचिट दे दी।


