40साल सेवा बाद मिला न्याय, मिलेगा पूरा पेंशन लाभ:हाईकोर्ट- “40 साल काम लेने के बाद ‘अस्थायी’ बताकर सरकार नहीं रोक सकती हक”

40साल सेवा बाद मिला न्याय, मिलेगा पूरा पेंशन लाभ:हाईकोर्ट- “40 साल काम लेने के बाद ‘अस्थायी’ बताकर सरकार नहीं रोक सकती हक”

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी ने विभाग में लंबी अवधि तक सेवा दी है, तो उसे केवल ‘अस्थायी’ बताकर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस रेखा बोराणा की एकल पीठ ने चूरू जिले के रतनलाल सैनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए 1 दिसंबर को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मानते हुए उसे पेंशन और अन्य लाभ जारी करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता रतनलाल सैनी, जो चूरू की तारानगर तहसील के निवासी हैं, ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और नियमितीकरण की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि रतनलाल ने विभाग में लगभग 40 साल तक अपनी सेवाएं दी हैं, लेकिन उन्हें नियमित नहीं किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। 40 साल की नौकरी को अस्थायी नहीं मान सकते याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि रतनलाल, अक्टूबर 2021 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जब कर्मचारी ने जीवन के चार दशक विभाग को दिए हैं, तो उसे पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों (Retiral benefits) से वंचित करना अनुचित है। दूसरी ओर, सरकार की तरफ से पेश वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति नियमित चयन प्रक्रिया के माध्यम से नहीं हुई थी और वह अस्थायी आधार पर कार्यरत थे, इसलिए वे नियमितीकरण के हकदार नहीं हैं। कोर्ट ने कन्हैयालाल नाई मामले को बनाया आधार कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए इसी तरह के एक अन्य मामले ‘कन्हैयालाल नाई बनाम राजस्थान राज्य’ के फैसले को आधार बनाया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि “37 साल की सेवा देने के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि सेवा अस्थायी थी। इतनी लंबी सेवा को मौलिक (Substantive) सेवा माना जाना चाहिए।” जस्टिस रेखा बोराणा ने उस फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार या उसके अधिकारी किसी व्यक्ति को उसकी सेवाओं के बदले मौलिक अधिकारों का दावा करने से वंचित नहीं कर सकते। कोर्ट के निर्देश: पेंशन दें, एरियर नहीं कोर्ट ने संदर्भ केस के फैसले के आधार पर रतनलाल सैनी की याचिका को निस्तारित (Disposed of) करते हुए निर्देश दिए: कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतिवादी (विभाग) याचिका में किए गए दावों की सत्यता की जांच करने के लिए स्वतंत्र हैं और यदि दावे सही पाए जाते हैं, तो याचिकाकर्ता के पक्ष में उचित आदेश पारित किए जाएं।

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